सफलता की पहली जंग कुदरत से
ओम प्रकाश कसेरा
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आज का यह लेख उन अड़चनों और कठिन परिस्थितियों पर आधारित है, जिनके कारण हमें कभी कभी ऐसा लगता है कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है, परिस्थितियाँ हमारे विरुद्ध हैं और प्रकृति स्वयं हमसे जंग कर रही है।
लेकिन क्या वास्तव में परिस्थितियाँ हमारे विपरीत होती हैं? या फिर प्रकृति कठिनाइयों के माध्यम से हमें कुछ सिखाना, समझाना और जीवन की अगली चुनौती के लिए तैयार करना चाहती है?
इसी गहरे विचार को इस लेख में प्रेरक कहानियों के साथ इस प्रकार पिरोया गया है कि पाठक की रुचि अंत तक बनी रहे और वह स्वयं एक सार्थक निष्कर्ष तक पहुँच सके।
यह लेख विशेष रूप से बच्चों और युवाओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। सभी पाठकों से विनम्र आग्रह है कि इसे पूरा अवश्य पढ़ें और अपने बच्चों के साथ भी साझा करें, ताकि वे आज के चुनौतीपूर्ण परिवेश में आध्यात्मिक दृष्टि, सकारात्मक सोच और जीवन की कठिनाइयों से जूझने की सही समझ प्राप्त कर सकें।
सफलता की पहली जंग: कुदरत से या खुद से?
मान लीजिए, बरसों की टालमटोल के बाद आज आपने अपने सबसे बड़े सपने पर पहला कदम रखा। किसी ने परीक्षा की किताबें खोलीं, किसी ने नए व्यवसाय की नींव रखी, तो किसी ने अपनी पुरानी कमजोरी को हराने की ठानी। सुबह रगों में बिजली सा उत्साह था, लेकिन शाम ढलते ही पहली रुकावट सामने आ खड़ी हुई। आवेदन खारिज हुआ, बजट कम पड़ा या किसी ने तंज कस दिया, "यह तुम्हारे बस का नहीं।" रात होते होते मन भी कायरों की तरह फुसफुसाने लगा कि शायद वक्त सही नहीं है। लेकिन क्या पहली ठोकर सचमुच लौट जाने का संकेत है, या कुदरत बस यह परख रही है कि आपका इरादा सिर्फ सुबह का झाग था या चट्टान जैसा कोई ठोस संकल्प?
चलते वक्त अगर जूते में कंकड़ आ जाए, तो हम मंजिल नहीं बदलते; बस ठहरकर कंकड़ निकालते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। जीवन की मुश्किलें भी वही कंकड़ हैं, जो आपको रोकने नहीं, बल्कि आपकी तैयारी की कमियां सुधारने और चाल को मजबूत करने आती हैं। दुनिया सफलता के मंच पर बजती तालियां देखती है, उस तक पहुंचे छिले हुए पांव नहीं। सोशल मीडिया सिर्फ परिणाम दिखाता है, पसीने से भीगी रातें नहीं।
सच यह है कि कोई भी बड़ा मुकाम देने से पहले प्रकृति आपकी पात्रता का एक कड़ा इंटरव्यू लेती है। जितनी ऊंची चोटी होगी, हवा उतनी ही पतली होगी। यह जंग कायनात से नहीं, अपने भीतर के डर और जल्द हार मान लेने वाली मानसिकता से है। अगली बार जब कोई बाधा आए, तो राह मत छोड़िए; बस अपने जूते का कंकड़ निकालिए और दोगुनी रफ्तार से आगे बढ़िए। क्योंकि पहली ठोकर रास्ता बंद करने नहीं, मुसाफिर का दम नापने आती है।
“पहली बाधा अक्सर रास्ता बंद करने नहीं, यात्री की तैयारी जाँचने आती है।”
जब सुरसा आपका रास्ता रोके
हर रुकावट 'रावण' नहीं होती: मैनाक, सुरसा और सिंहिका का विवेक
रास्ते में खड़ा हर अवरोध आपका संहार करने आया शत्रु नहीं होता; कुछ बाधाएं ‘सुरसा’ बनकर सिर्फ यह नापने आती हैं कि आपके पास केवल बाहुबल है या संकटमोचक बुद्धि भी। सुरसा आपको हराने नहीं, आपकी रणनीति की धार पैनी करने आती है। यदि आवेदन खारिज हुआ तो हुनर तराशिए, बजट तंग है तो कदम छोटे रखिए और सामने बंद दीवार दिखे तो खिड़की तलाशिए। यह अंधी जिद का नहीं, युक्ति और लचीलेपन का खेल है। जब राजतिलक से ठीक पहले श्रीराम को वनवास और बाल्यकाल में श्रीकृष्ण को कालिया और कंस का सामना करना पड़ा, तो हम शून्य संघर्ष की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
समुद्र लांघते हनुमान जी के मार्ग में आई तीन रुकावटें आज की ज़िंदगी का सबसे सटीक आईना हैं। पहले ‘मैनाक’ आया, जिसने आदर और विश्राम का प्रस्ताव रखा; हनुमान जी ने हाथ जोड़कर उसका मान रखा, पर रुके नहीं, क्योंकि प्रशंसा और आराम का 'कंफर्ट ज़ोन' अक्सर गति चुरा लेता है। फिर ‘सुरसा’ ने रास्ता रोका, तो ताकत का तमाशा खड़ा करने के बजाय उन्होंने खुद को तिल बराबर सूक्ष्म किया, पलक झपकते ही उसके मुख से बाहर आए और विनम्रता से आगे बढ़ गए। यह सिखाता है कि जहां अहंकार टकराए, वहां ज्ञान और बुद्धि से शून्य होकर निकल जाना ही जीत है। लेकिन जब ‘सिंहिका’ ने छल से परछाई पकड़कर गति रोकनी चाही, तो उन्होंने कोई समझौता नहीं किया, बल्कि सीधा और निर्णायक संहार किया।
विडंबना यह है कि हम जीवन की हर समस्या पर एक ही हथौड़ा चलाने की भूल कर बैठते हैं। असली साहस हर दीवार से सिर फोड़ना नहीं, बल्कि दीवार के स्वभाव को समझकर सही रास्ता चुनना है। ठहरकर खुद से पूछिए कि आज आपकी राह में कौन खड़ा है: क्या वह मैनाक जैसा कोई मीठा भटकाव है, सुरसा जैसी कोई परीक्षा जो लचीलापन मांग रही है, या सिंहिका जैसी कोई जहरीली साजिश जिसे तुरंत खत्म करना जरूरी है? कुदरत का यह इम्तिहान कोई शाप नहीं, बस एक सवाल है कि जिस बड़े मुकाम की आपको चाहत है, क्या उसे संभालने लायक विवेक और परिपक्वता आपके भीतर जाग चुकी है?
कुदरत आपकी योग्यता का इंटरव्यू लेती है
जब एक सामान्य संस्था किसी बड़ी ज़िम्मेदारी से पहले कड़ा इंटरव्यू लेती है, तो फिर ज़िंदगी बिना जांचे परखे इतना बड़ा मुकाम कैसे सौंप देगी?
हम अक्सर कुदरत से रास्ता आसान बनाने की मिन्नतें करते हैं, पर कुदरत रास्ते से कांटे हटाने के बजाय यात्री के पैरों को मजबूत करती है। राज्याभिषेक की दहलीज पर खड़े श्रीराम का जीवन जब एक ही रात में वनवास की ओर मुड़ा, तो वह केवल सिंहासन छिनने का आघात नहीं था। उन चौदह वर्षों के दुर्गम संघर्ष, वंचितों के साथ, वन वन के भटकाव और युद्ध की भट्टी ने ही उन्हें अयोध्या के 'राजा राम' से 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम' के रूप में तराशा।
एक बाज एक ही डाल पर बैठा रहता है। अनेक उड़ाने की कोशिशें विफल होती हैं। अंत में एक व्यक्ति डाल काट देता है और बाज अब दूसरा आशियाना ढूंढता है । कभी कभी जीवन में प्रिय डाल इसलिए काटना पड़ता है कि कुछ उससे बेहतर चाहिए ।
यदि जीवन की हर योजना हमारे अनुसार पूरी हो जाए तो क्या हमारी छिपी क्षमता कभी सामने आएगी? क्या सुविधा हमें वह धैर्य, नेतृत्व और संबंध दे सकती है जो संघर्ष देता है?
“कुदरत हमेशा मंजिल नहीं बदलती, कई बार वह मंजिल के योग्य मनुष्य तैयार करती है।”
यदि जूते में कंकड़ पड़ा हो तो समझदार व्यक्ति दर्द सहते हुए मीलों नहीं चलता। वह पहले रुकता है, जूता उतारता है, कंकड़ निकालता है और फिर गति पकड़ता है। लेकिन हम जीवन में कई बार यही सरल समझ भूल जाते हैं। मन में अपमान, संबंध में गलतफहमी, काम में अधूरी तैयारी और शरीर में लगातार थकान का कंकड़ पड़ा रहता है, फिर भी हम गति बढ़ाने की कोशिश करते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि छोटी समस्या बड़ा घाव बन जाती है।
क्या आपके जीवन के जूते में भी कोई कंकड़ है? कोई लंबित बातचीत, कोई अधूरा कौशल, कोई पुराना भय, कोई स्वास्थ्य संबंधी लापरवाही या कोई ऐसी आदत जो हर कदम पर चुभ रही है? हर रुकना हार नहीं होता। कभी कभी आगे बढ़ने के लिए पहले रुककर बाधा साफ करनी पड़ती है।
हमें पद चाहिए, लेकिन भार नहीं। हमें सम्मान चाहिए, लेकिन अनुशासन नहीं। हमें शिखर चाहिए, पर चढ़ाई में साँस फूलते हैं ।
यदि जीवन में कोई चुनौती ही न आए तो हमें अपनी शक्ति और जीवन के रस का पता कैसे चलेगा? ईसीजी की चलती हुई ऊपर नीचे रेखा जीवन का संकेत है, जबकि सीधी रेखा अंत का। उसी प्रकार बंद मशीन जंग खाने लगती है। बंदरगाह पर लंबे समय तक निष्क्रिय खड़ा जहाज धीरे धीरे रखरखाव की समस्या में घिर जाता है। लंबे समय तक न चलने वाली गाड़ी की बैटरी बैठ जाती है, पुर्जे जाम हो सकते हैं। शरीर उपयोग न हो तो मांसपेशियाँ कमजोर होती हैं और मस्तिष्क को चुनौती न मिले तो उसकी सक्रियता घटने लगती है।
जहाज बंदरगाह में सुरक्षित अवश्य है, लेकिन वह केवल सुरक्षित खड़े रहने के लिए नहीं बनाया गया। छाता को धूप और पानी से बचाने के लिए नहीं बनाया गया है । मनुष्य भी केवल जोखिम से बचते रहने के लिए नहीं बना। उसे सीखना, चलना, गिरना, संभलना और अपने भीतर की क्षमता को उपयोग में लाना है।
आपदा में समर्पण नहीं, युक्ति खोजिए
संकट आते ही मन दो भ्रांतियों में भागता है। या तो वह घबराकर हार मान लेता है, या बिना सोचे सीधी टक्कर लेने लगता है। आपके पास कितना बल है, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन खतरे के बीच आपका मन कितनी देर सक्रिय रहता है, यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
एक कुत्ता भूल से शेर की गुफा में पहुँच जाता है। सामने शेर आता दिखाई देता है। भागने का मार्ग नहीं, शरीर से मुकाबला संभव नहीं, फिर भी कुत्ता समर्पण नहीं करता। वह पास पड़ी हड्डियाँ मुँह में लेकर ऊँची आवाज़ में कहता है कि एक शेर खाकर मज़ा आ गया, दूसरा मिल जाए तो भूख मिटे। शेर यह सुनकर भ्रमित होता है और पीछे हट जाता है।
पेड़ पर बैठा बंदर पूरी सच्चाई देख रहा था। वह शेर को भेद बताकर उसकी मित्रता पाना चाहता है। शेर बंदर को पीठ पर बैठाकर लौटता है। अब संकट पहले से बड़ा है, क्योंकि पहली युक्ति का रहस्य खुल चुका है। कुत्ता फिर भी अपना मन बंद नहीं करता। वह बिना पीछे देखे ऊँची आवाज़ में कहता है, यह बंदर कितना निकम्मा है, इतनी देर पहले भेजा था और अब एक शेर लेकर आया है। शेर को लगता है कि बंदर ने उसे फँसाया है और वह फिर भाग जाता है।
पहली योजना का रहस्य खुल जाने पर भी कुत्ते की सोच बंद नहीं हुई। क्या हम ऐसा कर पाते हैं? हमारी पहली योजना असफल हो जाए तो क्या हम स्वयं को असफल घोषित कर देते हैं? कोई हमारी तरकीब समझ जाए तो क्या हम अगली तरकीब खोजते हैं? घबराहट विकल्प घटाती है, संयम नई युक्ति दिखाता है।
“संकट में सबसे पहले रास्ता नहीं, हमारा सोचने का ढंग बंद होता है।”
परेशानियाँ हमें सीखने का अवसर देती हैं, क्योंकि कोई भी कार्य हमारे लिए केवल पहली बार नया होता है। वही काम दूसरी बार अनुभव बन जाता है और तीसरी बार कौशल।
दूरी मुश्किल नहीं होती, मुश्किल तो केवल पहला कदम होता है। रास्ता चलने से खुलता है, केवल नक्शा देखते रहने से नहीं।
जीवन की जंग में केवल चलना नहीं, कई बार सबसे तेज दौड़ना पड़ता है, कम से कम अपने प्रतिस्पर्धियों से तेज। जंगल में दो व्यक्ति जा रहे थे। अचानक सामने शेर दिखाई दिया। पहला व्यक्ति तुरंत अपने जूते के फीते कसने लगा। दूसरे ने घबराकर कहा, अब इसका क्या लाभ, क्या तुम शेर से तेज भाग सकते हो? पहले व्यक्ति ने शांत होकर उत्तर दिया, मुझे शेर से तेज नहीं भागना, मुझे केवल तुमसे तेज भागना है।
यह कहानी किसी गलत प्रतिस्पर्धा का समर्थन नहीं करती, बल्कि परिस्थितिजन्य समझ का रूपक मात्र है।
हर प्रतियोगिता में विश्व का सर्वश्रेष्ठ बनना आवश्यक नहीं, लेकिन अपने निकटतम मानक से बेहतर तैयारी करना आवश्यक हो सकता है। परीक्षा में सभी प्रश्नों का ज्ञाता होना जरूरी नहीं, उपलब्ध समय में दूसरों से अधिक सटीक उत्तर देना जरूरी हो सकता है। व्यवसाय में पूरी दुनिया जीतना जरूरी नहीं, ग्राहक को प्रतिस्पर्धी से थोड़ा बेहतर मूल्य देना जरूरी हो सकता है। जीवन की दौड़ में प्रश्न यह है कि क्या हम तैयार है और जूते बाँध रहे हैं या शेर को देखकर बहस कर रहे हैं ।
कुछ लोग अपने कार्य इसलिए शुरू नहीं कर पाते क्योंकि वे योजना पर योजना बनाते हैं, जोखिम की सूची तैयार करते हैं, सही समय खोजते हैं और छह महीने बाद पता चलता है कि वे अभी भी बारीकी से ही सोच रहे हैं।
बहानेबाजी एक बीमारी है। किसी काम को करने से अधिक थकान कई बार उस काम को न करने के लिए रोज़ नए कारण खोजने और टालमटोल करने से होती है।
एक हतोत्साहित सेना युद्ध नहीं जीत सकती। युद्धभूमि में केवल हथियार नहीं, मनोबल भी लड़ता है। यही बात जीवन की जंग में लागू होती है।
गढ्ढे में कुछ मेंढक गिर जाते है उसमें एक बहरा भी रहता है । दूसरे मेंढक उसे गड्ढे से निकलने से रोकने के लिए चिल्लाते हैं, बोलते हैं मुश्किल है, नामुमकिन है, असंभव है, बेकार है, प्रयास का कोई फायदा नहीं ।
लेकिन वह उनकी आवाज़ को प्रोत्साहन समझकर प्रयास करता रहता है और बाहर निकल आता है। क्योंकि उसकर नेगेटिविटी वाले शब्दों का कोई असर नहीं था ।
बाकी मेढक यह मान लेते है कि वह बाहर नहीं निकल पाएंगे क्योंकि वह सुनी सुनाई अवधारणा में फंस गये और प्राण त्याग देते है ।
समस्या आते ही कुछ लोग समाधान से पहले यह तय करने लगते हैं कि दोष किसका है। लेकिन युक्ति कौन खोजेगा, इस प्रश्न पर मौन छा जाता है।
पंचतंत्र की कथा में चिड़िया अपने बच्चों को खाने वाले साँप से सीधे नहीं लड़ सकती। शरीर की शक्ति में तुलना ही नहीं है। वह रानी का हार उठाकर साँप के बिल के पास गिराती है। सैनिक हार लेने आते हैं, साँप को देखते हैं और उसे मार देते हैं। कमजोर चिड़िया ने अन्याय स्वीकार नहीं किया, उसने उपलब्ध व्यवस्था और बुद्धि को अपना साधन बनाया। शक्ति केवल शरीर में नहीं, योजना में भी होती है।
कुदरत के संकेत हमे सचेत करती है ।
लगातार थकान संकेत है कि शरीर विश्राम, जाँच या अनुशासन माँग रहा है।
लेकिन संकेत हमें उपचार, परिश्रम या वास्तविक सहायता से दूर कर रहा है तो वह मार्गदर्शन नहीं, भ्रम हो सकता है। कुदरत संकेत देती है, पर विवेक उनका अनुवाद करता है।
कभी कभी भगवान ऐसे भी रास्ता देते है: सूरदास जी का एक पद है:
“अब कैं राखि लेहु भगवान।
हौं अनाथ बैठयौ द्रुम डरिया, पारधि साधे बान।
ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान।
दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह, कौन उबारै प्रान।
सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूटयौ संधान।
सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान॥”
एक ओर शिकारी बाण साधे बैठा है, ऊपर बाज मंडरा रहा है और बचने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता। तभी साँप शिकारी को डसता है, हाथ से छूटा बाण बाज को लगता है और जीवन बच जाता है।
संदेश यह है कि हमारी दृष्टि जहाँ अंतिम दीवार देखती है, परिणाम के संसार में वहाँ भी कोई अनदेखा मार्ग शेष हो सकता है बस जरूरत है हिम्मत न हारने की और विश्वास पर टिके रहने की ।
कभी कभी अवसर छिपकर आती है और हम उसे अनदेखा करते है:
बाढ़ में फँसा एक व्यक्ति ईश्वर से बचाने की प्रार्थना करता है। पानी लगातार बढ़ रहा होता है। तभी एक नाव उसके पास पहुँचती है, लेकिन वह व्यक्ति नाव में बैठने से मना कर देता है। वह कहता है, “मुझे पूरा विश्वास है, भगवान स्वयं मुझे बचाने आएँगे।”
कुछ देर बाद बचाव दल आता है और उसे साथ चलने के लिए कहता है, पर वह फिर वही उत्तर देता है, “मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता नहीं है। भगवान मेरी रक्षा करेंगे।” इसके बाद एक और सहायता उसके पास पहुँचती है, लेकिन वह उसे भी लौटा देता है।
अंततः पानी बहुत बढ़ जाता है और वह व्यक्ति डूब जाता है। भगवान के पास पहुँचकर वह शिकायत करता है, “मैंने आप पर इतना विश्वास किया, फिर भी आपने मुझे बचाया क्यों नहीं?”
भगवान उत्तर देते हैं, “मैंने तुम्हें बचाने के लिए नाव भेजी, बचाव दल भेजा और दूसरी सहायता भी पहुँचाई, लेकिन तुमने हर अवसर को ठुकरा दिया। अब बताओ, मैं तुम्हें और किस प्रकार बचाता?”
चमत्कार की प्रतीक्षा में उपलब्ध नाव को जाने देना आस्था नहीं, अवसर की अवहेलना है। कुदरत की मदद अक्सर किसी व्यक्ति, संकेत, अवसर अथवा छोटे रास्ते के रूप में हमारे पास आती है।
चमत्कार की प्रतीक्षा में उपलब्ध नाव को जाने देना आस्था नहीं, अवसर की अवहेलना है।
“कुदरत की मदद अक्सर संकेत, व्यक्ति, अवसर और छोटे रास्ते के रूप में आती है।”
हम कुदरत को दोष देते हैं। क्या कुदरत ने कोई नाव भेजी थी जिसे हमने अहंकार में लौटा दिया? क्या कोई व्यक्ति सलाह लेकर आया था जिसे हमने छोटा समझा? क्या कोई वैकल्पिक रास्ता था जिसे हमने इसलिए नहीं अपनाया क्योंकि वह हमारे मन की पटकथा जैसा नहीं था?
कुदरत उन लोगों को रास्ता अधिक स्पष्ट दिखाती है जो चलने के लिए तैयार होते हैं।
जब मन लक्ष्य के प्रति स्पष्ट होता है तो वह विकल्प खोजता है। जब विश्वास जुड़ता है तो प्रयास कुछ समय अधिक टिकता है। जब प्रयास टिकता है तो योग्यता बढ़ती है। जब योग्यता बढ़ती है तो वही दुनिया जो पहले बंद दिखाई देती थी, नए दरवाज़े दिखाने लगती है।
एक प्रचलित प्रेरक कथा में किसी युवक का कुत्ता भाग जाता है। वह उसे खोजने के लिए विज्ञापन देता है। विज्ञापन देखकर एक युवती कुत्ता लौटाती है, दोनों का परिचय होता है और संबंध आगे बढ़ता है। एक दिन मिलने जाते समय युवक की दुर्घटना होती है। अस्पताल की जाँच में मस्तिष्क की गंभीर बीमारी समय रहते पता चलती है और उपचार हो जाता है। युवक पीछे मुड़कर सोचता है कि यदि कुत्ता न भागता, परिचय न होता और वह उस दिन न निकलता तो बीमारी शायद देर से पकड़ में आती।
क्या आप कुदरत से रास्ता माँगते हुए उसके भेजे छोटे संकेत देख रहे हैं? और क्या आप संकेत को कर्म में बदलने के लिए तैयार हैं?
रास्ता पहले से बना मिले, यह जरूरी नहीं; चलते हुए रास्ता बनना भी कुदरत का उत्तर है।
सबसे मजबूत जंजीर मन के भीतर बनती है
कुदरत से पहली जंग बाहर दिखाई देती है, लेकिन कुछ समय बाद पता चलता है कि सबसे कठिन युद्ध भीतर है।
बाज का बच्चा यदि मुर्गियों के बीच पले तो वह स्वयं को मुर्गी मान सकता है। ऊपर आकाश में उड़ते बाज को देखकर उसके भीतर कोई हलचल होती है, लेकिन आसपास की आवाज़ें कहती हैं कि तू उड़ने के लिए नहीं बना। यदि वह मान ले तो आजीवन मुर्गी बनकर रह जाए । उसे अपनी ताकत पहचानना होगा ।
हम भी पुराने प्रयास की हार को वर्तमान क्षमता का अंतिम प्रमाण बना लेता है।
सर्कस का हाथी बचपन में मजबूत जंजीर तोड़ने का बहुत प्रयास करता है और असफल रहता है। बड़ा होकर शक्तिशाली हो जाता है, लेकिन पतली रस्सी से बँधा खड़ा रहता है, क्योंकि उसके मन ने हार स्वीकार कर ली। रस्सी अब शरीर को कम, स्मृति को अधिक बाँध रही है। वह अब कोशिश भी नहीं करता है । हार चुका है, मान चुका है । वह अपनी ताकत भूल गया है ।
आपको कौन सी पुरानी रस्सी बाँधे हुए है? किसने कहा था कि आप नहीं कर सकते और आप आज भी उसका वाक्य ढो रहे हैं?
एक पिंजरे में पाँच बंदरों को रखा गया और बीच में एक सीढ़ी खड़ी करके उसके सबसे ऊपरी सिरे पर पके हुए केलों का एक गुच्छा लटका दिया गया। स्वाभाविक रूप से, जैसे ही एक बंदर की नज़र केलों पर पड़ी, उसने सीढ़ी की तरफ दौड़ लगाई। जैसे ही उसके कदम पहली पायदान पर पड़े, पिंजरे के ऊपर लगे पाइपों से बर्फ जैसा ठंडा पानी तेज धार के साथ छूट पड़ा। पानी सिर्फ सीढ़ी पर चढ़ने वाले पर ही नहीं, बल्कि नीचे खड़े बाकी चारों बंदरों पर भी बेरहमी से बरसाया गया। ठिठुरते हुए सभी बंदर किसी तरह जान बचाकर कोने में दुबक गए। कुछ देर बाद जब दूसरे बंदर ने दोबारा कोशिश की, तो वही भयानक मंजर दोहराया गया। थोड़ी देर में पाँचों यह जान गए कि सीढ़ी की तरफ कदम बढ़ाने की कीमत पूरे समूह को चुकानी पड़ती है।
इसके बाद प्रयोगकर्ताओं ने ठंडे पानी का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया और समूह के एक पुराने बंदर को हटाकर उसकी जगह एक नया, अनजान बंदर पिंजरे में डाल दिया। नए बंदर को कमरे के नियमों का कोई इल्म नहीं था; उसने छत पर लटके केले देखे और उछलकर सीढ़ी की तरफ लपका। इससे पहले कि वह पहला कदम रखता, बाकी चार बंदर उस पर झपट पड़े और उसे घसीटकर बुरी तरह पीटने लगे। नया बंदर हक्का बक्का रह गया। उसे समझ नहीं आया कि पिटाई किस बात की हुई है, लेकिन दर्द के डर ने उसे यह जरूर सिखा दिया कि सीढ़ी के पास जाना वर्जित है।
सिलसिला आगे बढ़ा और एक एक करके सभी पुराने बंदरों को नए बंदरों से बदल दिया गया। जब भी कोई नया सदस्य आता और केलों की तरफ बढ़ता, बाकी समूह, जिसमें वे बंदर भी शामिल थे जो खुद कभी ठंडे पानी से नहीं भीगे थे, पूरी ताकत से उस पर टूट पड़ते। अंततः पिंजरे में पाँच ऐसे बंदर रह गए जिन्होंने कभी उस बर्फीले पानी की एक बूँद तक नहीं देखी थी।
अब अगर कोई उन पाँचों में से किसी को भी सीढ़ी की ओर बढ़ता देखता, तो बाकी चारों बिना किसी झिझक के उसे खींचकर पीटने लगते। यदि उस पिंजरे में बोलने की शक्ति होती और कोई उन बंदरों से पूछता कि वे किसी को सीढ़ी पर चढ़ने से क्यों रोक रहे हैं, तो शायद उनका एक ही जवाब होता: "हम नहीं जानते, लेकिन हमारे यहाँ चीजें हमेशा से ऐसे ही होती आई हैं।" यही वह बिंदु है जहाँ एक बीता हुआ भय बिना तर्क वाली परंपरा बनकर आने वाली पीढ़ियों की सोच को जकड़ लेता है।
वास्तविक साहस दर्द मिटाना नहीं, उसके बाद अर्थ बनाना है
प्रेरक कथाएँ सुनना सरल है, लेकिन वास्तविक जीवन की पीड़ा में कोई पृष्ठभूमि संगीत नहीं बजता।
विराट कोहली के पिता का निधन दिसंबर 2006 में उस समय हुआ जब वे दिल्ली के लिए रणजी ट्रॉफी मैच खेल रहे थे। गहरे व्यक्तिगत दुःख के बावजूद वे अगले दिन मैदान पर लौटे और महत्वपूर्ण पारी खेली। यह विराट के कर्तव्यबोध और मानसिक शक्ति का उदाहरण है ।
अरुणिमा सिन्हा वर्ष 2011 की रेल दुर्घटना में एक पैर खोने के बाद भी रुकी नहीं। दर्द केवल शरीर का नहीं था, जीवन की पूरी दिशा बदल चुकी थी। कृत्रिम पैर के साथ प्रशिक्षण, चोट, थकान और अनगिनत संदेहों से गुजरते हुए उन्होंने वर्ष 2013 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की। उन्होंने जीवन का नया अर्थ बनाया सिर्फ रोती नहीं रही ।
“दर्द घटना का सत्य हो सकता है, पर वह आपके भविष्य का अंतिम लेखक नहीं है।”
जब परेशानी आए तो हर बार यह मत मानिए कि आपको कुछ नया सीखना, बदलना या बेहतर करना है।
घड़े की मिट्टी को गूँथा, पीटा और आग में तपाया जाता है, तब वह पानी सँभालने योग्य बनती है। सोना गलाया जाता है, हीरा तराशा जाता है, पत्थर को छैनी की चोट सहनी पड़ती है और खेत की मिट्टी को चीरकर जुताई होती है, तभी बीज के लिए जगह बनती है। ठीक होने की दवाएँ भी कई बार कड़वी होती हैं।
एक ही पहाड़ से निकले पत्थरों में से कुछ चोट सहकर मूर्ति बनते हैं, जिन पर बाद में फूल चढ़ते हैं। जो प्रक्रिया के बीच टूटकर बिखर जाते हैं, वे रास्ते के कंकड़ बन सकते हैं और उन्हीं पर नारियल फोड़ा जाता है। श्रीराम के जीवन के संघर्षों ने ही उन्हें केवल अयोध्या के राम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनने की यात्रा दी।
समाज कमी गिनाता है, समाधान मनुष्य बनाता है
किसी योजना की कमी बताइए, लोग तुरंत जुड़ जाते हैं। उसी कमी को सुधारने के लिए समय, श्रम या जिम्मेदारी माँगिए, भीड़ अचानक छोटी हो जाती है। एक चित्र सार्वजनिक स्थान पर रखकर कहा जाए कि जहाँ गलती दिखे वहाँ निशान लगा दें तो कुछ ही समय में चित्र निशानों से भर सकता है। वही चित्र रखकर कहा जाए कि जहाँ गलती दिखे उसे सुधार दें तो हाथ कम उठेंगे।
आप केवल गलतियों पर निशान लगा रहे हैं या किसी एक कमी को सुधार भी रहे हैं? “समाज को आईना दिखाना आवश्यक है, लेकिन आईना पकड़ने वाला हाथ समाधान में भी लगना चाहिए।”
पहली जंग से अंतिम विजय तक
अब पूरे लेख को अपने जीवन के सामने रखिए। आपकी सुरसा कौन है, आपका जूते का कंकड़ क्या है और कौन सी पतली रस्सी केवल पुरानी असफलता की स्मृति से आपको बाँधे हुए है? कौन सी नाव सहायता बनकर आई, लेकिन आपने उसे इसलिए लौटा दिया क्योंकि वह चमत्कार जैसी नहीं दिखती थी?
आप आगे बढ़ेंगे तो बाधाएँ आएँगी। कुछ मैनाक की तरह आकर्षक विश्राम देंगी, कुछ सुरसा की तरह बुद्धि की परीक्षा लेंगी और कुछ सिंहिका की तरह आपकी गति पकड़ेंगी। कहीं तत्परता चाहिए, कहीं नाव पहचानने का विवेक, कहीं चिड़िया जैसी योजना और कहीं बाज की तरह कटती डाल ।
कभी समाज आपको मुर्गी, बँधा हाथी या कुएँ का मेंढक बनाकर सीमित करना चाहेगा। कभी व्यक्तिगत दुःख विराट कोहली की तरह कर्तव्य और भावना के कठिन मोड़ पर खड़ा करेगा। कभी अरुणिमा सिन्हा की तरह जीवन का अर्थ दोबारा लिखना होगा। और कभी केवल चित्र पर निशान लगाने के बजाय उसे सुधारने के लिए हाथ बढ़ाना होगा।
पहली जंग कुदरत से होगी, लेकिन कुदरत अंतिम शत्रु नहीं है। वह कभी परीक्षा, कभी शिक्षक, कभी आईना और कभी सहयोगी बनकर सामने आती है।
रात काली हो सकती है, पर वह सुबह को रोक नहीं सकती। संकट आपको गिरा सकता है, लेकिन वह आपकी अंतिम दिशा तय नहीं कर सकता।
साँस सँभालिए, परिस्थिति पढ़िए, सहायता पहचानिए, पुरानी डाल छोड़िए और नई युक्ति खोजिए। कुदरत से जंग कीजिए, उससे सीखिए, उससे निवेदन कीजिए और पूरी निष्ठा से कर्म कीजिए।
एक दिन वही कुदरत, जो रास्ता रोकती दिखाई देती थी, आपके कदमों के नीचे नया रास्ता बिछाती हुई मिलेगी।
लेखक: ओम प्रकाश कसेरा
ओम प्रकाश कसेरा पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक तथा सामाजिक और प्रेरक विषयों के लेखक हैं। मानवीय संबंधों, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।


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