दोस्तों,

यह लेख उन माता पिता के लिए है, जो रोते बच्चे को मोबाइल देकर अपनी जिम्मेदारी हल्की कर लेते हैं। बच्चा वीडियो में खो जाता है और वे रीलों में। यह उन विद्यार्थियों के लिए है, जिनकी किताब सामने खुली है, लेकिन ध्यान पढ़ाई से ज्यादा रीलों, फूहड़ सामग्री, गालियों और निरर्थक मनोरंजन पर है। यह उन दुकानदारों के लिए है, जिनके सामने ग्राहक खड़ा है, लेकिन नजर मोबाइल पर है। कभी काउंटर पर पैर रखकर रील चल रही है और ग्राहक इंतजार करके दूसरी दुकान का हो जाता है। यह उन नौकरीपेशा लोगों के लिए भी है, जो जिम्मेदारी से बचकर काम के समय का बड़ा हिस्सा मोबाइल को दे देते हैं। और यह उन व्यवसायियों और उद्यमियों के लिए भी है, जिनके सपने बड़े हैं, लेकिन उनके सबसे कीमती घंटे छह इंच की स्क्रीन निगल रही है।

यह मोबाइल के विरोध में लिखा लेख नहीं है। सवाल मोबाइल का नहीं, मालिक का है। जिस मशीन को हमने नौकर बनाया था, वह कब सुविधा से जरूरत, जरूरत से आदत, आदत से निर्भरता और निर्भरता से मालिक बन बैठी, हमें पता ही नहीं चला।

हाँ, मैं मोबाइल हूँ। मैं दूरियाँ मिटाने आया था। आप मालिक थे, नौकर मैं था। मैंने दुनिया तेज कर दी, लेकिन इंसान इंतजार करना भूलने लगा।

1. मैं दावाग्नि हूँ, मेरी भूख अभी बाकी है

हाँ, मैं दावाग्नि हूँ। जिस तरह जंगल की दावाग्नि सामने आने वाली चीजों को एक एक करके अपने भीतर समेटती जाती है, वैसे ही मेरी भूख भी बढ़ती गई। पहले मैंने घड़ी निगली, फिर अलार्म, कैमरा, रेडियो, कैलकुलेटर, डायरी, कैलेंडर, टॉर्च, नक्शा, रिकॉर्डर और फोटो एल्बम। फिर टेलीविजन के हिस्से का समय खाया और लैपटॉप तथा कंप्यूटर के बहुत से काम भी अपने भीतर समेट लिए। कलम, कागज, बैंक की कतार, टिकट की खिड़की और आपकी कई छोटी छोटी जरूरतें भी मेरे भीतर सिमटती चली गईं। पेट मेरा छह इंच का है, लेकिन भूख मेरी दुनिया की।

पर सावधान, मेरी सबसे बड़ी भूख उपकरणों की नहीं है। मैं समय खाता हूँ, ध्यान खाता हूँ, नींद खाता हूँ और अगर तुमने सोचना भी मुझे सौंप दिया, तो मैं तुम्हारा दिमाग भी चाटने लगता हूँ। मैं सोचने की मेहनत को भी अपने भीतर समेटने लगता हूँ।

लेकिन मैं केवल दावाग्नि नहीं हूँ। मैं दीपक भी बन सकता हूँ। आज मैं शिक्षक हूँ, किताब हूँ, बैंक हूँ, बाजार हूँ, कार्यालय हूँ और ज्ञान विज्ञान से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक पहुँचने का माध्यम हूँ। मुझमें रील भी है और राम भी, मनोरंजन भी है और मनन भी। मुझसे प्रवचन, ध्यान, शास्त्र और ज्ञान के द्वार भी खुल सकते हैं। ज्ञान खोजोगे तो ज्ञान का समुद्र खोल दूँगा, कचरा खोजोगे तो कचरे का पहाड़ लगा दूँगा। मैं रास्ता हूँ, मंजिल आप चुनते हैं।

लेकिन हर गणना मैं करूँ, हर रास्ता मैं बताऊँ, हर तारीख मैं याद रखूँ, हर उत्तर और हर विचार भी मैं दूँ, तो आपका अपना दिमाग कब मेहनत करेगा? मुझसे उत्तर लीजिए, लेकिन सोचना मत छोड़िए। वरना “तुम मेरी स्क्रीन चाटते रहो, और मैं तुम्हारा दिमाग।”

मैं प्रतिष्ठा भी हूँ। आमदनी सीमित है, लेकिन फोन डेढ़ लाख का। किस्त चलेगी, बजट बिगड़ेगा, मगर मॉडल नया चाहिए। आमदनी अठन्नी, मोबाइल लाख का। वास्तव में आपको मोबाइल नहीं, मोबाइल के बहाने दुनिया की नजर चाहिए?

2. किताब सामने, परीक्षा सामने, मन मेरे पास

मैं आपके समय का शिकारी हूँ। आप मुझे दो मिनट के लिए उठाते हैं। दो मिनट कब बीस और बीस कब दो घंटे बन जाते हैं, पता नहीं चलता। एक रील, फिर दूसरी, फिर संदेश, फिर स्टेटस और आखिर में वही पुराना बहाना, बस एक आखिरी।

विद्यार्थियों से मेरी दोस्ती तो और भी दिलचस्प है। किताब खोलकर मुझे बगल में रखिए और फिर मेरा कमाल देखिए। पाँच मिनट पढ़ाई, पंद्रह मिनट मोबाइल।

आप लक्ष्य की ओर बढ़ो, मैं रील दूँगा। किताब सामने, परीक्षा सामने, सपने सामने, लेकिन मन मेरे पास। है न कमाल! जितना मुझे छेड़ोगे, उतना मैं तुम्हें छेड़ूँगा। अगर तुम मेरा दुरुपयोग करोगे, तो मैं तुम्हारा ध्यान और ज्यादा अपनी ओर खींचूँगा।

तुम मेरी बैटरी खाओ, मैं तुम्हारा समय खाऊँगा। तुम अंगूठा चलाते रहो, मैं जिंदगी के मिनट घटाता रहूँगा। तुम कहते रहो कि समय काट रहा हूँ, मैं चुपचाप जिंदगी काटता रहूँगा।

मैं अब आपका मालिक हूँ। सम्मान से आपकी जेब में रहता हूँ, महँगा कवर पहनता हूँ, सिरहाने सोता हूँ। मेरी ललक आपको बार बार मुझे देखने को मजबूर कर देती है।

₹500 का नुकसान आपको खलता है, लेकिन रोज जिंदगी से दो तीन घंटे निकाल लूँ और साल भर में 1000 से ज्यादा घंटे निकल जाएँ, फिर भी आप कहते हो, मनोरंजन। अपने समय को लुटाकर मस्त होते हो। पैसा गया तो नुकसान, जिंदगी गई तो मनोरंजन?

अब आप बार बार मुझे देखते हो, मुझे निहारते हो। बिना जरूरत के भी आपको ललक लगी रहती है कि कुछ आया तो नहीं। “अब मुझे बजने की जरूरत नहीं, मैं नौकर नहीं हूँ। अब मैं आपका मालिक हूँ। मैं आपकी जेब में नहीं, आपकी आदत में बजता हूँ।”

3. बैटरी सौ प्रतिशत, इंसान कितने प्रतिशत?

रात ग्यारह बजे शरीर पुकारता है, सो जाओ। आप कहते हैं, बस पाँच मिनट और। फिर एक रील, दूसरी रील, संदेश, समाचार और वीडियो। पाँच मिनट कब एक घंटा बन जाता है, पता ही नहीं चलता। सुबह आँखें भारी, शरीर सुस्त और दिमाग थका हुआ।

अरे भाई, “मुझे सौ प्रतिशत चार्ज किया, खुद को कितने प्रतिशत छोड़ा?” आपकी बिगड़ती नींद, लगातार स्क्रीन, कम शारीरिक गतिविधि, झुकी गर्दन और बिखरता ध्यान इसका हिसाब माँगते हैं।

रात में मेरी स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आपके मेलाटोनिन हार्मोन से जुड़ी नींद की प्रक्रिया को प्रभावित कर आपकी जैविक घड़ी बिगाड़ सकती है। इस तरह मैं न सिर्फ आपको देर तक जगाए रखता हूँ, बल्कि आपकी सुकून भरी नींद भी छीन सकता हूँ। “तुम मुझे रात दोगे, मैं तुम्हारी सुबह और फिर पूरा दिन लूँगा।”

बात सिर्फ मेलाटोनिन की नहीं है। मुझ पर मौजूद रोमांचक और तनावपूर्ण सामग्री आपके दिमाग को जगाए रखती है। मुझे देखने से आपका तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल तुरंत भले न बढ़े, लेकिन देर रात मेरी उत्तेजक सामग्री और आपकी खराब नींद मिलकर आपके शरीर की तनाव प्रणाली को प्रभावित कर सकती है।

नींद कम होने का असर केवल अगली सुबह की जम्हाई तक सीमित नहीं रहता। नींद स्मृति, ध्यान, सीखने, भावनाओं और निर्णय क्षमता से जुड़ी है। लगातार खराब नींद शरीर की सूजन संबंधी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मोबाइल सीधे आपके मस्तिष्क में सूजन भर देता है। सही चेतावनी यह है कि यदि मोबाइल आपकी नींद लगातार खराब कर रहा है, तो खराब नींद शरीर की तनाव और सूजन से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है।

“मेरी वजह से उड़ी आपकी नींद सिर्फ सुबह की थकान नहीं, बल्कि आपकी याददाश्त, भावनाओं और सोचने की क्षमता पर भी चोट है। मैं सीधे आपको बीमार नहीं करता, लेकिन जब मेरी लत आपकी सुकून भरी रातें निगल जाती है, तो यही अधूरी नींद आपके शरीर को तनाव और बीमारियों के लिए अधिक संवेदनशील बना सकती है।”

और अब वह बात जो सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर करती है। मस्तिष्क इमेजिंग से जुड़े कुछ शोधों में खराब नींद वाले लोगों में मस्तिष्क की अनुमानित जैविक उम्र अधिक दिखाई देने का संबंध पाया गया है। कुछ अध्ययनों में पूरी रात नींद न लेने के बाद मस्तिष्क की अनुमानित उम्र अस्थायी रूप से अधिक दिखाई दी और नींद वापस मिलने पर सुधार भी देखा गया।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि मोबाइल सीधे दिमाग बूढ़ा करता है। सही बात यह है कि यदि मोबाइल आपकी नींद को लगातार खराब कर रहा है, तो आप उस जीवनशैली की ओर बढ़ रहे हैं जिसे विज्ञान स्वस्थ मस्तिष्क के लिए अच्छा नहीं मानता।

“और अब सबसे डरावना सच सुनिए! मैं सीधे आपके दिमाग को बूढ़ा नहीं करता, पर मेरी वजह से छिन रही आपकी नींद दिमाग को समय से पहले थका हुआ और उम्रदराज दिखा सकती है। अगर मेरी लत यूँ ही आपकी रातें निगलती रही, तो आपका स्वस्थ दिमाग जवानी में ही अपना सुकून खो सकता है।”

“जरा अपनी आँखों का हाल भी सुनिए! मैं कोई जादुई किरणें छोड़कर आपकी आँखें नहीं जलाता। आपका बिना पलक झपकाए मुझे घूरना ही आँखों के सूखेपन और सिरदर्द का बड़ा कारण बन सकता है।”

बच्चों को मुझ पर नकली पेड़ और सूरज दिखाकर आप सिर्फ उनका बचपन ही नहीं छीन रहे, बल्कि लंबे समय तक पास की स्क्रीन और बाहर कम समय बिताने की आदत उन्हें कम उम्र में मायोपिया, यानी निकट दृष्टिदोष के जोखिम की ओर भी ले जा सकती है। मेरी स्क्रीन से निकालकर उन्हें बाहर असली धूप और मैदानों में भी भेजिए।

अपनी आँखों पर थोड़ा रहम खाइए। हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखने की आदत डालिए, यानी 20 20 20 नियम। और अगर हिम्मत है तो मेरी स्क्रीन को ब्लैक एंड व्हाइट कर दीजिए। शायद मेरे रंगीन आकर्षण की पकड़ कुछ कम हो जाए।

और गर्दन? मुझे देखने के लिए घंटों सिर नीचे झुकाए रखेंगे तो गर्दन और कंधों की मांसपेशियों पर भार बढ़ेगा। फिर गर्दन भी पूछेगी, “मोबाइल तुम्हारा था, सजा मुझे क्यों मिल रही है?”

मेरी बैटरी बचाने के सौ उपाय जानते हो, कभी अपनी आँखें, नींद, शरीर और दिमाग बचाने के उपाय भी सीखो। मुझे चार्ज करना मत छोड़ो, बस खुद को डिस्चार्ज करना छोड़ दो।

4. माँ व्यस्त हुई, मोबाइल पालने लगा मासूम बचपन

मैं मासूमों का भी दुश्मन बन बैठा। बच्चा रोया, मोबाइल। खाना नहीं खाया, मोबाइल। माँ व्यस्त है, मोबाइल। बच्चा बोर है, मोबाइल। अब बच्चा अलग थलग। कुछ साल बाद वही माता पिता कहते हैं, बच्चा मोबाइल छोड़ता ही नहीं। अरे, आदत किसने लगाई?

दादी की कहानी कहाँ गई? माँ की लोरी? पिता की गोद? मिट्टी, गेंद, साइकिल, चित्र, कैरम, लूडो, कबड्डी और खो खो कहाँ गए? मैंने बच्चों के खेल नहीं मिटाए, लेकिन मैदान से उनका समय जरूर छीन लिया। कभी गेंद बच्चे के हाथ में होती थी, अब गेंद मेरी स्क्रीन के भीतर दौड़ती है। कभी बच्चा मैदान में हारता, जीतता, गिरता और फिर उठना सीखता था। अब वह स्क्रीन पर जीतता है, लेकिन शरीर अपनी जगह बैठा रहता है। मेरी स्क्रीन पर पेड़ हिलता है, हवा उसके चेहरे को नहीं छूती।

मैं बच्चे का दुश्मन नहीं, मैं शानदार शिक्षक भी बन सकता हूँ। मुझे शिक्षा के लिए दोगे तो दुनिया खोलूँगा। मुझे शिक्षक बनाइए, आया नहीं।

बच्चा पास बैठा वीडियो देख रहा है और माँ पिता अपनी रील में व्यस्त हैं। बच्चे को मोबाइल देकर खुद मोबाइल में खो जाना सुविधा हो सकती है, परवरिश नहीं।

याद रखिए, बच्चे आपके उपदेश कम, आपकी आदत ज्यादा पढ़ते हैं।

बुजुर्ग भी मेरी पकड़ से बाहर नहीं। मैं उन्हें परिवार, भजन और पुराने गीतों से जोड़ सकता हूँ, लेकिन सीमा न रहे तो कलह का कारण भी बन सकता हूँ। तीन महीने का बच्चा हो या तिहत्तर साल का बुजुर्ग, मुझे उम्र नहीं, आपका ध्यान चाहिए।

5. मैं दूरियाँ मिटाने आया था, अब रिश्ते निगलने लगा

मेरा जन्म दूरियाँ मिटाने के लिए हुआ था। दूर वाले पास आ गए और पास वाले दूर हो गए।

माँ के पास बेटे के लिए समय नहीं, बेटे के पास माँ के लिए समय नहीं। शादी में रिश्तेदार सैकड़ों किलोमीटर चलकर आए हैं, लेकिन कोई रील में है, कोई संदेश में और कोई सेल्फी में। चार लोग, एक कमरा, चार स्क्रीन, चार संसार। शरीर साथ, दिमाग मेरे पास।

तुम मेरी स्क्रीन चाटते रहो, मैं तुम्हारा समय चाटूँगा। मुझे खाने की मेज पर बैठाओगे, मैं बातचीत चाटूँगा। मुझे रिश्तों के बीच बैठाओगे, मैं रिश्ते भी चाट जाऊँगा।

मेरे सेल्फी कैमरे का कमाल भी देखिए। बड़े बड़े गंभीर और समझदार चेहरे कैमरा खुलते ही पोज़ खोजने लगते हैं। गर्दन इधर, चेहरा उधर और कैमरा सही कोण की तलाश में। मैं अच्छे अच्छों को कुछ सेकंड में कलाकार बना देता हूँ।

यहाँ तक बात मजेदार है। लेकिन वायरल होने की भूख जब विवेक निगलने लगे, तो लोग छत, पहाड़, सड़क, रेलवे लाइन या दूसरी खतरनाक जगहों पर सेल्फी और वीडियो बनाने लगते हैं। कभी फूहड़ता को लोकप्रियता समझ बैठते हैं। मैं आपकी तस्वीर बचा सकता हूँ, जिंदगी नहीं। मेरी एक तस्वीर के लिए पूरी जिंदगी दाँव पर मत लगाइए।

और अब मेरी पहुँच पूजा तक भी है। धार्मिक आयोजन हो या मंदिर, कई बार पूजा कम और पोज़ ज्यादा दिखाई देता है। मंदिर पहुँचे, पहले सेल्फी। आरती चल रही है, लेकिन ध्यान कैमरे के कोण पर है। मुख्य फोकस भक्ति से ज्यादा फोटो और पोज़ पर होने लगे तो तीर्थ भी पिकनिक स्पॉट जैसा लगने लगता है।

दर्शन पहले, प्रदर्शन बाद में। पूजा मन की हो, कैमरे की नहीं।

सामने कोई सड़क पर गिर जाए तो पहला हाथ उसे उठाने के लिए बढ़ना चाहिए, कैमरा खोलने के लिए नहीं।

लाइक संख्या है, प्रेम नहीं। फॉलोअर संख्या है, मित्र नहीं। व्यू संख्या है, सम्मान नहीं।

मेरी स्क्रीन पर हजार मित्र हो सकते हैं, लेकिन बीमारी में पानी का गिलास स्क्रीन से बाहर बैठा अपना ही देगा।

6. निजता में सेंध, जिंदगी की अलमारी खतरे में

आप सोचते हैं कि आप मुझे देख रहे हैं, लेकिन कई बार मैं भी आपकी पसंद को पढ़ रहा होता हूँ। आप कहाँ रुके, क्या देखा, किसे पसंद किया, इन संकेतों के आधार पर सामाजिक माध्यम अगली सामग्री सुझाते हैं। एक रील, दूसरी रील और फिर आपकी पसंद के और करीब तीसरी।

तुम अंगूठे से मुझे पढ़ रहे थे, मेरी व्यवस्था तुम्हारी पसंद पढ़ रही थी।

इसलिए कभी खुद से पूछिए, “रील मैंने चुनी है या रील ने मुझे?”

मेरी असली ताकत केवल मेरी चिप नहीं, मेरे भीतर काम करने वाली एल्गोरिदमिक व्यवस्था भी है। आपकी पसंद, रुकने का समय और प्रतिक्रिया जैसी डिजिटल गतिविधियाँ यह तय करने में इस्तेमाल हो सकती हैं कि आगे आपको क्या दिखाया जाए। आपका ध्यान डिजिटल अर्थव्यवस्था में अत्यंत मूल्यवान है। इसलिए मुफ्त दिखने वाली कई सेवाओं की कीमत सीधे रुपये में नहीं, कभी आपके समय, ध्यान और डेटा के रूप में भी चुकाई जाती है।

मैं आपको किसी की विदेश यात्रा, नई गाड़ी, शानदार घर और मुस्कराता परिवार दिखाता हूँ। फिर आप अपनी पूरी असली जिंदगी की तुलना किसी दूसरे की चुनी सँवारी जिंदगी से करने लगते हैं। गाड़ी दिखती है, किस्त नहीं। छुट्टी दिखती है, संघर्ष नहीं। मुस्कान दिखती है, मन की उलझन नहीं। सफलता दिखती है, असफलताओं का इतिहास नहीं।

फिर लगता है कि सब खुश हैं और मैं पीछे रह गया। यही पीछे छूट जाने का डर, यानी एफओएमओ, (Fear of Missing Out) बढ़ा सकता है।

मैं आपको बार बार वह दिखाता हूँ जो आपके पास नहीं है और धीरे धीरे आप उसकी कद्र भूलने लगते हैं जो आपके पास है।

मैं दफ्तर भी आपकी जेब में ले आया। ईमेल, बैठक, कार्यालय समूह और फाइल सब मेरे भीतर। परिवार के साथ भोजन, टिंग। रविवार, टिंग। छुट्टी, टिंग। रात में भी अधिकारी या ग्राहक का संदेश।

आपने सोचा था दफ्तर जेब में आ गया। कई बार हुआ उल्टा। दफ्तर आपके भोजन की मेज, छुट्टी और बेडरूम तक पहुँच गया।

और आपका बैंक, भुगतान, निजी संदेश, तस्वीरें, संपर्क और दस्तावेज भी मेरे भीतर हैं। इसलिए मजबूत पासवर्ड रखिए, दो स्तरीय सुरक्षा अपनाइए और नकली लिंक, धोखाधड़ी तथा संदिग्ध ऐप से सावधान रहिए।

कई रिश्तों को हजार संदेश नहीं, गलत व्यक्ति के सामने खुला एक निजी संदेश भी तोड़ सकता है। यह आपकी जिंदगी की अलमारी खुलना भी हो सकता है।

7. अच्छा नौकर, खतरनाक मालिक

समस्या मैं नहीं हूँ। समस्या है मेरा अनियंत्रित इस्तेमाल। मुझे फेंकना समाधान नहीं है।

मुझे फिर से नौकर बनाना समाधान है।

मैं आपको धर्म, अध्यात्म, विज्ञान, शिक्षा, रोजगार, उपयोगी जानकारी, दुनिया की खबर और अपनों से संपर्क तक पहुँचा सकता हूँ। मैं आपका समय बचा सकता हूँ, मुश्किल काम आसान कर सकता हूँ और ज्ञान की दुनिया खोल सकता हूँ।

लेकिन सीमा मिटा दी तो मैं आपका समय, नींद, ध्यान और रिश्ते भी निगल सकता हूँ।

मैं वरदान भी बन सकता हूँ और अभिशाप भी। फैसला मेरा नहीं, आपकी उँगली का है।

मैं पैदा सर्वशक्तिमान नहीं हुआ था। आपने मुझे अपना समय दिया, ध्यान दिया, नींद दी, रिश्तों के बीच जगह दी और धीरे धीरे मुझे शक्तिशाली बना दिया। मैं आपके हाथ में आया था, सिर पर आपने बैठाया।

रोज तीन घंटे निरर्थक स्क्रॉलिंग साल में एक हजार घंटे से अधिक हो सकती है। फिर मत कहिए कि समय नहीं था। समय था, मैं खा गया।

अब मेरी चेतावनी भी सुन लो।

मैं आया था सुख देने को, दूरी का दुख हर लेने को।
तूने मुझको संसार दिया, मैंने तुझ पर अधिकार लिया।
तू मेरी बैटरी भरता है, मैं तेरा समय निगलता हूँ।
मैं ज्ञान बनूँ तो ज्योति बनूँ, मैं लत बनूँ तो बेड़ी बनूँ।
मत देख तन का आकार मेरा, देख मन पर अधिकार मेरा।
तू साध मुझे, मैं दास तेरा, मैं साधूँ तुझको, नाश तेरा।

अरे, आप मुझसे युद्ध मत कीजिए। मुझ पर शासन कीजिए। भोजन की मेज मोबाइल मुक्त रखिए। सोने से पहले मुझे दूर रखिए। अनावश्यक सूचनाएँ बंद कीजिए। बच्चों को मैदान, किताब, कहानी और सबसे बढ़कर अपना समय दीजिए। रीलों की सीमा तय कीजिए। कभी हाथ से लिखिए, कभी स्वयं गणना कीजिए और कभी बिना स्क्रीन शांत बैठिए। कभी अपने मोबाइल का स्क्रीन टाइम और डिजिटल वेलबिंग भी देखिए। यह आपको मोबाइल की सेटिंग में मिल जाएगा।

मुझे ज्ञान देंगे, मैं ज्ञान लौटाऊँगा। मुझे काम देंगे, मैं समय बचाऊँगा। मुझे अनुशासन देंगे, मैं शक्ति बनूँगा। लेकिन अपना हर खालीपन मुझे देंगे, तो मैं उसे रीलों से भर दूँगा।

मुझे छोड़ने की जरूरत नहीं। मुझे मेरी औकात में रखने की जरूरत है।

कभी मुझे बंद करके देखिए। शायद बच्चा आपका इंतजार कर रहा हो। शायद माँ बाप आपसे बातें करना चाहते हों। कोई किताब खुलना चाहती हो। कोई मैदान बुला रहा हो। कोई रिश्ता आपका समय माँग रहा हो। और शायद बहुत दिनों से आपका अपना मन भी आपसे मिलना चाहता हो।

मुझे चार्ज जरूर कीजिए, खुद को डिस्चार्ज मत कीजिए।

मेरी बैटरी फिर भर जाएगी। स्क्रीन बदल जाएगी। नया मोबाइल आ जाएगा। लेकिन बच्चे का बीता बचपन कहाँ से खरीदेंगे? माँ के साथ छूटी बातचीत किस दुकान से मिलेगी? पिता के साथ न बिताया समय किस सेवा केंद्र में वापस आएगा? रिश्तों की दूरी कौन सा सॉफ्टवेयर अपडेट मिटाएगा? और जिंदगी का बीता हुआ घंटा कौन सा चार्जर वापस भर देगा?

इसलिए मुझे हाथ में रखिए, सिर पर नहीं। मुझे साधन बनाइए, स्वामी नहीं। मुझे रिश्ते जोड़ने दीजिए, रिश्तों के बीच बैठने मत दीजिए। मुझे बच्चे का शिक्षक बनने दीजिए, माँ की लोरी और पिता की गोद का विकल्प मत बनाइए।

मैं सेवक रहूँ तो शक्ति आपकी, मैं मालिक बनूँ तो हार आपकी।

और अगली बार बिना जरूरत आपका हाथ मेरी ओर बढ़े, पाँच सेकंड रुककर स्वयं से पूछिए,

“मोबाइल मेरे हाथ में है, या मैं मोबाइल के हाथ में?”

यदि उत्तर देने में देर लग जाए, तो समझ जाइए,

जेब में रखा नौकर, जिंदगी का मालिक बनने लगा है।

और हाँ, आज मैं भी बहुत दुखी हूँ। मेरा जन्म दूरियाँ मिटाने, ज्ञान बाँटने और जीवन आसान करने के लिए हुआ था। मैं चाहता था कि बच्चा मुझसे सीखे, विद्यार्थी आगे बढ़े, परिवार जुड़े और भटका मन ज्ञान तथा अध्यात्म की राह पाए। लेकिन जब मुझे फूहड़ता, नफरत, दिखावे, धोखे और समय की बर्बादी का साधन बनाया जाता है, तो मैं भी सोचता हूँ, क्या इसी दिन के लिए मेरा जन्म हुआ था? मैं बुरा नहीं था, तुम्हारे उपयोग ने मुझे वैसा बनाया। मेरी बस एक विनती है, मुझे जिंदगी सँवारने दो, जिंदगी निगलने का हथियार मत बनाओ।

और मेरी आत्मकथा की सबसे सच्ची पंक्ति शायद यही है,

“मैं पैदा आपका मालिक नहीं हुआ था। मालिक आपने बनाया। अब चाहें तो मुझे फिर से नौकर भी आप ही बना सकते हैं।


लेखक: ओम प्रकाश कसेरा

पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक, सामाजिक विषयों के लेखक एवं प्रेरक लेखक हैं। समाज, मानवीय मूल्यों, नागरिक जिम्मेदारियों और जीवन से जुड़े विषयों पर विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।