बधाई हो! हम कुछ ज़्यादा ही आज़ाद हो गए हैं

स्वतंत्र भारत में हमारी मानसिक परतंत्रता का आईना

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15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता किसी एक दिन में नहीं मिली थी। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, हजारों बलिदान और अनगिनत परिवारों की पीड़ा थी। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल और न जाने कितने ज्ञात अज्ञात लोगों ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जहाँ भारतीय अपने भविष्य का निर्णय स्वयं कर सकें। किसी ने जेल सही, किसी ने लाठियाँ खाईं, किसी ने घर छोड़ा और किसी ने जीवन। आज उस स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद एक प्रश्न हमसे उत्तर माँग रहा है, भारत तो आज़ाद हो गया, लेकिन क्या हमारी सोच भी आज़ाद हुई?

शायद पूरी तरह नहीं। हाथों की बेड़ियाँ टूट गईं, लेकिन मन ने नई बेड़ियाँ बना लीं। कभी कट्टरता की, कभी दिखावे की, कभी लोकप्रियता की, कभी भीड़ के पीछे चलने की। और इन सबके बीच हमने एक अद्भुत नई स्वतंत्रता भी हासिल कर ली है।

बधाई हो! हम इतने आज़ाद हो गए हैं कि अब हमें आज़ादी और मनमानी के बीच का अंतर भी बंधन लगने लगा है।

हम अपने कर्तव्यों, मर्यादाओं और नागरिक जिम्मेदारियों से भी काफी हद तक “आज़ाद” हो गए हैं। हमारे अधिकार हमें पूरी तरह याद हैं, बस कर्तव्यों वाला अध्याय पढ़ते समय शायद हमारा ध्यान कहीं और चला गया था। बधाई हो! हमने स्वतंत्रता को अधिकारों की खुली तिजोरी समझ लिया और कर्तव्यों की चाबी शायद कहीं खो दी।

हमें बोलने की आज़ादी मिली और हमने समझ लिया कि कुछ भी बोल देना ही अभिव्यक्ति है। असहमति का अधिकार मिला तो तर्क और तथ्य जुटाना अनावश्यक लगने लगा। दो गालियाँ लिखिए, एक भद्दा व्यंग्यचित्र बनाइए और स्वयं को क्रांतिकारी घोषित कर दीजिए। बधाई हो! हम आज़ाद हैं। शायद कुछ ज़्यादा ही आज़ाद हो गए हैं।

कचरा हमारा, सड़क सरकार की। कचरा फेंकने की आज़ादी। नियम हम तोड़ें, व्यवस्था खराब। झूठी खबर हम फैलाएँ, समाज संभाले प्रशासन। भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए, लेकिन अपना काम हो तो थोड़ा “जुगाड़” चल सकता है। बधाई हो! हमें व्यवस्था ईमानदार चाहिए, लेकिन अपनी बेईमानी को हमने बड़ी आसानी से “जुगाड़” नाम दे दिया।

हमने नागरिकता का बड़ा सुविधाजनक सिद्धांत खोज लिया है, अधिकार निजी हैं और कर्तव्य सरकारी। अधिकार अपना है और कर्तव्य दूसरे का। बधाई हो! हमें अपने अधिकारों पर चोट तुरंत महसूस होती है, लेकिन अपने कर्तव्यों की मृत्यु पर कोई दर्द नहीं होता। हम चाहते हैं भगत सिंह पैदा हों, लेकिन दूसरों के घर में। हम चाहते हैं देश बदले, समाज सुधरे और व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था जैसी हो, बस एक छोटी सी शर्त है कि हमें स्वयं न बदलना पड़े।

बधाई हो! देश से हमारी अपेक्षाएँ आसमान जितनी हैं, लेकिन देश की हमसे क्या अपेक्षाएँ हैं, यह पूछने की फुर्सत नहीं। हम देश बदलने निकले हैं, लेकिन आईने में खड़े उस पहले नागरिक को बदलने के लिए आज भी तैयार नहीं हैं।

आईना सामने है, लेकिन हम उसमें भी किसी और का चेहरा ढूँढने में विशेषज्ञ हो चुके हैं।

कभी कभी आज़ादी की हमारी परिभाषा इतनी आगे निकल जाती है कि “भारत से आज़ादी” जैसी आवाजें भी सुनाई देती हैं। विडंबना देखिए, कभी लोग भारत की आज़ादी के लिए अपना जीवन दे रहे थे और आज स्वतंत्र भारत में कोई भारत से आज़ादी की बात करता है। सरकार से असहमत हैं तो रहिए, प्रश्न पूछिए, आलोचना कीजिए। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है, लेकिन राष्ट्र इन सबसे बड़ा होता है।

और यदि आज़ादी इतनी ही प्यारी है तो कुछ और आज़ादियाँ भी माँगकर देखिए। आलस्य से आज़ादी माँगिए, मोबाइल की लत से आज़ादी माँगिए, नशे से आज़ादी माँगिए, जातीय और धार्मिक घृणा से आज़ादी माँगिए, झूठी खबरों और भ्रष्ट सोच से आज़ादी माँगिए, महिलाओं के अपमान की मानसिकता से आज़ादी माँगिए। शायद तब पता चले कि सबसे कठिन गुलामियाँ हमेशा बाहर नहीं होतीं, कई हमारे भीतर सिंहासन लगाकर बैठी होती हैं।

आलोचना कीजिए, पूरी शक्ति से कीजिए, लेकिन गाली को विचार मत समझिए। असहमति और अभद्रता एक बात नहीं हैं। गाली किसी तर्क की धार नहीं बढ़ाती। अक्सर वह केवल यह बताती है कि तर्क समाप्त हो चुका है।

सामाजिक माध्यमों ने इस नई आज़ादी को शानदार बाजार दे दिया है। ज्ञान की बात कीजिए, दस हजार लोग देखेंगे। थोड़ी गाली जोड़िए, एक लाख। विवाद पैदा कीजिए, पाँच लाख। किसी का अपमान कीजिए, दस लाख। अश्लीलता जोड़ दीजिए, शायद और तेजी से प्रसिद्ध हो जाएँ। फिर गर्व से घोषणा कीजिए, “अपना लड़का तो प्रसिद्ध हो गया!” लेकिन प्रसिद्ध किस बात के लिए? यह पूछना शायद अब पुरानी सोच है।

फिर हम चिंता करते हैं कि समाज में संस्कार कम क्यों हो रहे हैं। शायद इसका उत्तर हमारे हाथ में पकड़ी स्क्रीन पर ही चल रहा है। बच्चे वही समाज देख रहे हैं जिसे हम उनके लिए बना रहे हैं। उनसे संस्कारों की उम्मीद करने से पहले एक बार अपनी स्क्रीन का इतिहास भी देख लेना चाहिए।

हमने प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा के बीच का अंतर लगभग मिटा दिया है। प्रसिद्ध होना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन सम्मान के योग्य होना चरित्र की उपलब्धि है।

हमारे डिजिटल जीवन का चित्र भी कम रोचक नहीं है। अच्छी किताब मिली तो बाद में पढ़ेंगे। नया कौशल सीखने का अवसर मिला तो सहेज लिया। उपयोगी व्याख्यान के लिए समय नहीं है। लेकिन विवाद वाला वीडियो पूरा देखा, टिप्पणी भी की और रात को प्रेरणादायक वीडियो देखकर सो गए कि कल से जिंदगी बदलेंगे। सुबह मोबाइल हाथ में आया और वही चक्र फिर शुरू। बधाई हो! हम कुछ ज़्यादा ही आज़ाद हो गए। अपनी इच्छाशक्ति को हरा दिया और हम जीत गए!

लगभग 52 सेकंड राष्ट्रगान के लिए खड़े होना लंबा लग सकता है, लेकिन पाँच घंटे छोटे वीडियो देखते हुए आत्मा नहीं दुखती। माता पिता पाँच मिनट बात करना चाहें तो समय नहीं है, लेकिन किसी अनजान व्यक्ति के पचास वीडियो देखने का धैर्य है। रात के डेढ़ बजे तक मोबाइल चलाने के बाद सुबह वही स्वतंत्र नागरिक कहता है, “जिंदगी में समय ही नहीं मिलता।”

बधाई हो! मोबाइल आपके हाथ में कम और आप मोबाइल के हाथ में ज्यादा हैं।

और शायद यह आज़ादी अब मोबाइल तक सीमित नहीं रही।

बधाई हो! हम इतने ज़्यादा आज़ाद हो गए हैं कि अब अपने माता पिता से भी आज़ादी चाहिए। जिन हाथों ने हमें उँगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी हमारे लिए लगा दी, उन्हीं को वृद्धाश्रम में छोड़ आना भी हमें सामान्य लगने लगा है। हम रिश्तों से भी आज़ाद, जिम्मेदारियों से भी आज़ाद और शायद संवेदनाओं से भी आज़ाद होते जा रहे हैं।

हाल ही में समाचारों में एक विचलित कर देने वाला दृश्य सामने आया, जहाँ एक पिता के अंतिम संस्कार में उनकी संतानें स्वयं उपस्थित नहीं हुईं। अंतिम संस्कार किसी अन्य व्यक्ति के हाथों संपन्न हुआ, संतानें मोबाइल के माध्यम से उससे जुड़ीं और पैसे भी भेजे गए। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार उसी दौरान यह सवाल भी सुनाई दिया कि “और कितना समय लगेगा?” सोचिए, जिस पिता ने अपने बच्चों के लिए जीवन के अनगिनत वर्ष लगा दिए, उसकी चिता के सामने भी समय का यह प्रश्न कितना विचलित करता है। किसी को पैसे देकर कर्मकांड कराया जा सकता है, लेकिन क्या पैसे देकर संतान का कर्तव्य और संवेदना भी निभाई जा सकती है?

बधाई हो! हम इतने आज़ाद हो गए हैं कि माता पिता से भी आज़ाद, रिश्तों से भी आज़ाद, जिम्मेदारियों से भी आज़ाद और अंततः शायद अपनी ही मानवता से भी आज़ाद होते जा रहे हैं।

देश की बेड़ियाँ 1947 में टूट गई थीं, मन की बहुत सी बेड़ियाँ तोड़ना अभी बाकी है।

और हमारी संवेदनशीलता का एक और दर्दनाक आईना सड़क पर दिखाई देता है। दुर्घटना हुई, घायल व्यक्ति पड़ा है, भीड़ जमा है और मोबाइल बाहर आ चुके हैं। कोई वीडियो बना रहा है, कोई बेहतर दृश्य लेने की कोशिश कर रहा है। क्योंकि हम जिम्मेदारियों से भी आज़ाद हो गए हैं। अरे, उसे अस्पताल कौन पहुँचाएगा? सड़क पर पड़ा घायल जब तक अनजान है, वह हमारे लिए एक वीडियो है। बस एक क्षण कल्पना कीजिए कि वह आपका कोई अपना हो। अचानक मोबाइल नीचे आ जाएगा और दिल धड़कने लगेगा। क्या हमारी संवेदना को जागने के लिए भी रिश्तेदारी का प्रमाण चाहिए?

देश केवल चौड़ी सड़कों, हवाई अड्डों, बड़ी अर्थव्यवस्था और नई तकनीक से विकसित नहीं होता। विकसित देश को जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए।

मेरे युवा मित्रों, आपके पास भी वही 24 घंटे हैं जिनमें कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, कोई नया व्यवसाय खड़ा कर रहा है, कोई नया कौशल सीख रहा है, कोई खेल में देश का नाम रोशन करने के लिए पसीना बहा रहा है और कोई रात दो बजे तक यह जानने में लगा है कि किसने किसे क्या कहा। प्रश्न समय का नहीं है। प्रश्न यह है कि आप अपनी आज़ादी से अपना भविष्य बना रहे हैं या किसी और की लोकप्रियता का भविष्य?

युवा होना केवल व्यवस्था से नाराज होने का नाम नहीं है। युवा होना ऊर्जा, साहस और परिवर्तन का नाम है। विद्रोही बनना है तो जरूर बनिए, लेकिन देश से नहीं, अपनी कमजोरियों से आज़ादी माँगिए। आलस्य से लड़िए, नशे से लड़िए, भ्रष्टाचार से लड़िए, झूठ से लड़िए, महिलाओं के अपमान और सामाजिक घृणा से लड़िए। अपनी उस आदत से लड़िए जो हर असफलता का दोष किसी दूसरे पर डाल देती है। देश को गाली देकर क्रांतिकारी बनना आसान है, देश के लिए स्वयं को बदलना कठिन है।

असली विद्रोही वह है जो भीड़ गलत दिशा में जा रही हो तब भी सही दिशा चुन सके। यही मानसिक स्वतंत्रता है।

हमारी परंपरा ने बहुत पहले कहा था, “अति सर्वत्र वर्जयेत्।” पानी जीवन देता है, लेकिन अति हो तो बाढ़ बन जाता है। आग भोजन पकाती है, लेकिन नियंत्रण से बाहर हो तो घर जला देती है। हमारी लोकपरंपरा भी यही सिखाती है, “अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।” जब जीवन की हर अच्छी चीज को संतुलन चाहिए तो स्वतंत्रता इसका अपवाद कैसे हो सकती है? स्वतंत्रता जब विवेक खो देती है तो स्वच्छंदता बन जाती है और उसका मूल्य पहले व्यक्ति, फिर परिवार, फिर समाज और अंततः राष्ट्र चुकाता है।

मानसिक रूप से स्वतंत्र वह नहीं है जो कहे, “मेरी मर्जी, मैं कुछ भी करूँगा।” मानसिक रूप से स्वतंत्र वह है जो अपनी मर्जी होते हुए भी सही को चुन सके। गाली दे सकते हैं लेकिन नहीं देते, यह स्वतंत्रता है। नियम तोड़ सकते हैं लेकिन उनका पालन करते हैं, यह स्वतंत्रता है। झूठी खबर फैला सकते हैं लेकिन सत्य जाँचते हैं, यह स्वतंत्रता है। किसी को अपमानित करके प्रसिद्ध हो सकते हैं लेकिन उसकी गरिमा चुनते हैं, यह स्वतंत्रता है। सरकार से असहमत हो सकते हैं लेकिन देश से अपना रिश्ता नहीं तोड़ते, यह लोकतांत्रिक परिपक्वता है। किसी घायल को देखकर रुकते हैं, यह नागरिक चरित्र है।

इस 15 अगस्त केवल एक दिन के लिए देशभक्त मत बनिए। तिरंगा लगाइए, राष्ट्रगान गाइए और मिठाई बाँटिए। लेकिन 16 अगस्त को यातायात संकेत पर भी रुकिए, सड़क पर कचरा मत फेंकिए, झूठी खबर मत फैलाइए, माता पिता को समय दीजिए, किसी घायल की सहायता कीजिए और रोज मोबाइल से थोड़ा समय छीनकर अपने भविष्य को दीजिए। शायद देशभक्ति का सबसे कठिन रूप यही है कि जब कोई देख नहीं रहा हो, तब भी अच्छा नागरिक बने रहें।

इस बार स्वयं का एक छोटा सा आत्मपरीक्षण भी कीजिए। मेरी सोच वास्तव में मेरी है या भीड़ की? मेरी भाषा विवेक से चलती है या क्रोध से? मुझे अपने अधिकार याद हैं, लेकिन कर्तव्य कितने याद हैं? मेरी स्वतंत्रता मेरे परिवार, समाज और राष्ट्र को मजबूत कर रही है या कमजोर? और सबसे कठिन प्रश्न पूछिए, मैं अपने देश के लिए कैसा नागरिक बन रहा हूँ?

उन लोगों ने शायद इसलिए बलिदान नहीं दिया था कि उनकी आने वाली पीढ़ियाँ 15 अगस्त को तिरंगा लगाएँ और 16 अगस्त को अपनी जिम्मेदारियाँ भूल जाएँ। उन्होंने हमें केवल एक स्वतंत्र देश नहीं दिया, उन्होंने हम पर भरोसा किया था कि हम उस स्वतंत्रता के योग्य नागरिक बनेंगे। इसलिए इस बार तिरंगे को सलामी देते समय केवल उनके बलिदान को याद मत कीजिए। मन ही मन एक वादा भी कीजिए कि उनकी दी हुई आज़ादी को अपने व्यवहार से छोटा नहीं करेंगे।

हम हर 15 अगस्त को अपने स्वतंत्रता सेनानियों और बलिदानियों को सलाम करते हैं। लेकिन एक क्षण के लिए उलटा प्रश्न भी सोचिए। यदि वे आज हमारे बीच आकर हमारी भाषा, हमारी संवेदनशीलता, हमारा सार्वजनिक व्यवहार और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति हमारा रवैया देखें, तो क्या वे भी हमें सलाम करना चाहेंगे?

अधिकार मिल जाना आज़ादी है, उनका सही उपयोग करना संस्कार है। बोल पाना आज़ादी है, क्या बोलना है यह जानना विवेक है। विरोध करना आज़ादी है, विरोध में मर्यादा रखना चरित्र है। अपने लिए जीना अधिकार है, लेकिन समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी समझना नागरिकता है।

देश को आज हमसे नारे कम और चरित्र ज्यादा चाहिए।

और इस स्वतंत्रता दिवस पर अंत में केवल एक प्रश्न स्वयं से पूछिए।

उन्होंने अपना जीवन देकर हमें आज़ादी के योग्य समझा था। क्या आज हमारा आचरण उनके उस विश्वास के योग्य है?

पहली आज़ादी उन्होंने हमें दिलाई थी। दूसरी आज़ादी हमें स्वयं हासिल करनी है। अपनी मानसिक गुलामी, गैर जिम्मेदारी, संवेदनहीनता और स्वच्छंदता से।

तो आज, स्वतंत्रता दिवस पर हमें यह प्रण भी करना चाहिए कि हम अपनी आज़ादी का आत्मपरीक्षण करेंगे। कहीं हमारी स्वतंत्रता हमें कुछ ज़्यादा ही आज़ाद करके स्वच्छंद, असंवेदनशील और गैर जिम्मेदार तो नहीं बना रही है? हमें अपने भीतर की विकृतियों, कमजोरियों, कट्टरता, आलस्य और संवेदनहीनता पर विजय पानी है। हमें केवल अधिकारों का भारत नहीं, कर्तव्यों और चरित्र का भारत बनाना है। ऐसा भारत जो मजबूत हो, सशक्त हो, संवेदनशील हो और जिसकी शक्ति केवल उसकी व्यवस्था में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आचरण में दिखाई दे।

भारत आज़ाद है। अब बारी हमारी सोच की है।

जय हिंद। जय भारत।

लेखक: ओम प्रकाश कसेरा

पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक, सामाजिक विषयों के लेखक एवं प्रेरक लेखक हैं। समाज, मानवीय मूल्यों, नागरिक जिम्मेदारियों और जीवन से जुड़े विषयों पर विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।