दोस्तों,
आज मित्रता दिवस है। यह केवल कैलेंडर में अंकित एक दिवस नहीं, बल्कि हमारे जीवन के सबसे अनमोल संबंध को अनुभव करने, उसका सम्मान करने और उसे हृदय से जीने का एक विशेष अवसर है। आइए, आज हम भारतीय संस्कृति, धर्मग्रंथों और महान चरित्रों के माध्यम से मित्रता के उस पवित्र महात्म्य की यात्रा करें, जहाँ मित्रता केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण, त्याग और संकट में अंतिम क्षण तक साथ निभाने का धर्म है।
मित्रता जीवन का वह पवित्र संबंध है, जिसे रक्त नहीं, विश्वास जोड़ता है। जब संसार साथ छोड़ दे, परिस्थितियाँ विपरीत हो जाएँ और व्यक्ति स्वयं पर विश्वास खोने लगे, तब जो हाथ उसका हाथ थामे रखता है, वही सच्चा मित्र होता है। मित्र हमारे सुख को बढ़ाता है, दुःख को बाँटता है, भूल करने पर रोकता है और टूटने पर हमें फिर से खड़ा करता है।
दोस्त वह नहीं, जो केवल खुशियों में साथ निभाए,
दोस्त वह है, जो गिरते हुए मित्र को फिर से उठाए।
संकट कभी सूचना देकर नहीं आता। दुर्घटना, बीमारी, आग अथवा आधी रात की किसी आकस्मिक आवश्यकता में दूर रहने वाले रिश्तेदारों को पहुँचने में समय लग सकता है। उस कठिन घड़ी में हमारे पड़ोसी और मित्र ही सबसे पहले दरवाजा खोलते हैं, वाहन लेकर दौड़ते हैं, अस्पताल पहुँचाते हैं और काँपते हुए कंधों को संभालते हैं। कई बार जब तक रिश्तेदार पहुँचते हैं, मित्र और पड़ोसी संकट का सबसे कठिन भाग हमारे साथ झेल चुके होते हैं। इसीलिए वे हमारे वास्तविक जीवन के प्रथम सहायक और निकटतम सुरक्षा कवच होते हैं।
मित्रता केवल घर के बाहर नहीं मिलती। परिवार में हमारी पत्नी हमारी सबसे निकट और विश्वसनीय मित्र होती है। वह चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपी चिंता, सफलता के पीछे का संघर्ष और मौन के भीतर की पीड़ा समझ लेती है। जब संसार केवल हमारी उपलब्धियाँ देखता है, तब पत्नी हमारी थकान, असफलता और कमजोरियों को भी अपनाती है। वह केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि सुख-दुःख की सहभागी, सलाहकार और जीवन की सबसे अच्छी मित्र भी होती है।
हमारे माता-पिता हमारे जीवन के प्रथम मित्र होते हैं। माता हमारे बोलना सीखने से पहले ही हमारा मौन समझ लेती हैं और पिता अपनी कठिनाइयाँ छिपाकर हमारे भविष्य का मार्ग बनाते हैं। संसार हमारी सफलता और सामर्थ्य देखकर साथ आता है, लेकिन माता-पिता तब से हमारे साथ रहते हैं, जब हमारे पास न कोई पहचान होती है, न पद और न उपलब्धि। उनके प्रेम में कोई स्वार्थ या प्रतिस्पर्धा नहीं होती, केवल त्याग, आशीर्वाद और हमारे कल्याण की कामना होती है।
हमारे प्राचीन शास्त्रों में भी इस बेजोड़ संबंध की महानता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है:
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
अर्थात जो व्यक्ति उत्सव में, संकट में, अकाल अथवा अभाव के समय, देश पर विपत्ति आने पर, राजा के दरबार में, अर्थात न्याय या शासन की कठिनाई में, और श्मशान घाट तक आपका साथ नहीं छोड़ता, वही सच्चा मित्र और वास्तविक आत्मीय है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है:
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥ - श्रीमद्भगवद्गीता 4.3
अर्थात मैंने आज वही प्राचीन और परम रहस्यमय योग तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो।
सच्चा मित्र केवल धन या सांसारिक वस्तुएँ नहीं देता, वह अपना श्रेष्ठतम ज्ञान भी मित्र को सौंप देता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को केवल सहायता नहीं दी, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता का वह अमर ज्ञान दिया, जो आज भी संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है।
“यह श्लोक केवल कुछ शब्द नहीं, बल्कि सच्ची मित्रता का वह दहकता हुआ प्रमाण है, जो प्रत्येक युग और प्रत्येक परिस्थिति में शत-प्रतिशत प्रासंगिक है। उत्सव में तो अनेक लोग हमारे आसपास दिखाई देते हैं, लेकिन विपत्ति में जो बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़ा रहता है, वही वास्तव में मित्र कहलाने का अधिकारी है।”
श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता में वैभव और अभाव आमने-सामने दिखाई देते हैं। एक ओर द्वारका का अपार ऐश्वर्य और दूसरी ओर फटे वस्त्रों में थोड़े से चिउड़े लेकर पहुँचे निर्धन सुदामा। दोनों की परिस्थितियों में जमीन और आसमान का अंतर था, लेकिन श्रीकृष्ण के हृदय में कोई भेद नहीं था।
वे अपना आसन छोड़कर दौड़े, सुदामा को हृदय से लगाया, अपने हाथों से उनके चरण धोए और उन्हें अपने आसन पर बैठाया। सुदामा सहायता माँग भी नहीं पाए, लेकिन श्रीकृष्ण ने उनकी अनकही पीड़ा समझ ली। उन्होंने बिना माँगे उनका अभाव दूर कर दिया और सहायता भी ऐसी की कि सुदामा का स्वाभिमान तनिक भी आहत नहीं हुआ। यही मित्रता की सुंदरता है—मित्र को अपनी विवशता बतानी न पड़े और उसका मौन भी समझ लिया जाए।
जो जगत के स्वामी हैं, वे एक निर्धन ब्राह्मण के चरण दबा रहे हैं। जिनके लिए खाने को हजारों प्रकार के रुचिकर भोग उपलब्ध हैं, वे सुदामाजी द्वारा लाए गए चावल को आँखें बंद करके, बड़े चाव, प्रसन्नता और स्वाद के साथ खा रहे हैं। यही मित्रता है।
वही श्रीकृष्ण, जो अखिल ब्रह्मांड के स्वामी हैं, मित्रता की मर्यादा ऐसी निभाते हैं कि सामान्य ग्वालबालों से खेल-खेल में हारकर और पिटकर भी प्रसन्नतापूर्वक लौटते हैं। उन्हें न कोई दुःख होता है, न अपने सामर्थ्य का अहंकार; वे सब कुछ आनंद से स्वीकार करते हैं, यही सच्ची और भेदरहित मित्रता है।
अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण ने मित्रता का प्रत्येक कर्तव्य निभाया। वे चाहते तो महाभारत युद्ध के सेनापति बन सकते थे, लेकिन अपने प्रिय मित्र के लिए सारथी बन गए। जिनके संकेत पर संपूर्ण सृष्टि चलती है, उन्होंने अर्जुन के संकेत पर रथ चलाया।
जब अर्जुन अपने संबंधियों को सामने देखकर मानसिक रूप से टूट गए और गांडीव हाथ से छूटने लगा, तब श्रीकृष्ण ने उनका उपहास नहीं किया। उन्होंने उनकी पीड़ा सुनी, भ्रम दूर किया और गीता का ज्ञान देकर उन्हें पुनः कर्तव्यपथ पर खड़ा किया। सच्चा मित्र हमारे प्रत्येक निर्णय का समर्थन नहीं करता; आवश्यकता पड़ने पर वह सारथी बनकर हमें सत्य दिखाता और सही मार्ग पर चलने का साहस देता है।
भगवान श्रीराम और वानरराज सुग्रीव की मित्रता भी विश्वास और वचनबद्धता की अद्भुत कथा है। अयोध्या के राजकुमार श्रीराम ने राज्य, पत्नी और सम्मान खोकर भय में जी रहे सुग्रीव को कभी छोटा नहीं समझा। अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता होते ही उन्होंने सुग्रीव को उनका राज्य और सम्मान वापस दिलाने का वचन दिया। श्रीराम ने उनकी तत्कालीन दुर्बलता नहीं, उनके भीतर छिपे भावी राजा को पहचाना और अपना वचन निभाकर उन्हें किष्किंधा के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कराया। सच्चा मित्र हमारी वर्तमान अवस्था से नहीं, हमारी संभावनाओं से प्रेम करता है।
जटायुजी का बलिदान मित्रधर्म की चरम सीमा है। वे महाराज दशरथ के पुराने मित्र थे। जब उन्होंने रावण को माता सीता का हरण करते देखा, तब वृद्ध होने के बाद भी उससे युद्ध करने लगे। वे जानते थे कि इस संघर्ष में उनके प्राण जा सकते हैं, फिर भी उन्होंने मित्र के परिवार की रक्षा को अपना धर्म माना।
रावण ने उनके पंख काट दिए, लेकिन उनके साहस और मित्रधर्म को नहीं काट सका। घायल जटायुजी ने श्रीराम के आने तक प्राण रोके, माता सीता के विषय में जानकारी दी और श्रीराम की गोद में प्राण त्याग दिए। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्ची मित्रता मित्र की उपस्थिति तक सीमित नहीं रहती; वह उसकी अनुपस्थिति में भी उसके परिवार, सम्मान और हितों की रक्षा करती है।
वनवास के समय निषादराज गुह ने श्रीराम को राज्यविहीन राजकुमार नहीं, अपने हृदय के मित्र के रूप में अपनाया। जब श्रीराम भूमि पर सोए, तब निषादराज उनकी सुरक्षा के लिए पूरी रात जागते रहे। संसार पद और वैभव छिनते ही व्यवहार बदल सकता है, लेकिन सच्चा मित्र परिस्थितियाँ बदलने पर अपना हृदय नहीं बदलता।
हनुमानजी और शनिदेव की मित्रता संकट में सहायता और कृतज्ञता का सुंदर संदेश देती है। रावण ने शनिदेव को लंका में बंदी बना रखा था और हनुमानजी ने उन्हें मुक्त कराया। उन्होंने इस सहायता के बदले किसी प्रतिफल की इच्छा नहीं की। कृतज्ञ शनिदेव ने हनुमानजी के भक्तों पर विशेष कृपा रखने का वचन दिया। हनुमानजी ने सहायता करके मित्रधर्म निभाया और शनिदेव ने उस उपकार को स्मरण रखकर उसे हनुमान भक्तों के प्रति कृपा के रूप में फलित किया।
अंगराज कर्ण का जीवन भी मित्र के प्रति निष्ठा का मार्मिक उदाहरण है। जब संसार ने उनकी योग्यता और कुल पर प्रश्न उठाया, तब दुर्योधन ने उन्हें अंगदेश का राजा बनाकर सम्मान दिया। बाद में श्रीकृष्ण ने कर्ण को पांडवों का ज्येष्ठ भ्राता और सम्राट बनने का अवसर दिया, फिर भी उन्होंने अपने मित्र का साथ छोड़ना स्वीकार नहीं किया और युद्धभूमि में प्राण त्याग दिए। हालाँकि यह प्रसंग हमें सावधान भी करता है कि मित्र के प्रति निष्ठा महान गुण है, परंतु सच्चे मित्र का कर्तव्य उसे अधर्म और विनाश के मार्ग पर जाने से रोकना भी है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपने अमर महाकाव्य रश्मिरथी में कर्ण की इसी अटूट मित्रता और वचनबद्धता को अत्यंत ओजस्वी शब्दों में व्यक्त किया है:
“मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन?
धरती की तो है क्या बिसात? आ जाय अगर बैकुंठ हाथ।
उसको भी न्योछावर कर दूँ, कुरुपति के चरणों में धर दूँ।”
इन पंक्तियों में कर्ण स्पष्ट कर देते हैं कि उनके लिए दुर्योधन की मित्रता पृथ्वी के साम्राज्य और बैकुंठ के सुख से भी अधिक मूल्यवान है। वे जानते थे कि दुर्योधन का मार्ग धर्मसम्मत नहीं है और महाभारत के युद्ध में उनकी मृत्यु भी निश्चित हो सकती है। वे यह भी जानते थे कि जिस पांडव पक्ष के विरुद्ध वे युद्ध करने जा रहे हैं, उसका मार्गदर्शन स्वयं परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण कर रहे हैं। इसके बाद भी उन्होंने अपना जीवन बचाने, राजसिंहासन प्राप्त करने अथवा पक्ष बदलने के स्थान पर अपने मित्र को दिया हुआ वचन निभाना चुना और युद्धभूमि में प्राण त्याग दिए।
चंदन और सर्प का उदाहरण मित्रता की मर्यादा का सुंदर प्रतीक है। सर्प के भीतर कितना भी विष क्यों न भरा हो, वह उस चंदन को अपना विष नहीं देता, जिसने उसे आश्रय दिया है। विषधर होकर भी वह आश्रय के संबंध का सम्मान करता है और चंदन भी अपनी शीतलता तथा सुगंध नहीं छोड़ता।
इसी प्रकार सच्ची मित्रता में एक-दूसरे के अवगुण ग्रहण नहीं किए जाने चाहिए। मित्रता का अर्थ मित्र की गलत आदतों, क्रोध, ईर्ष्या अथवा असत्य में सहभागी होना नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ मित्र के विश्वास का सम्मान करना, उसे गलत मार्ग से रोकना और अपने सद्गुणों की सुगंध से उसके जीवन को भी बेहतर बनाना है।
सच्चा मित्र हमारे दुःख को हल्का करता है, साहस को मजबूत बनाता है और जीवन को सुरक्षित करता है। वह कभी माता-पिता की तरह निःस्वार्थ, कभी पत्नी की तरह हमारे मौन को समझने वाला, कभी पड़ोसी की तरह संकट में सबसे पहले पहुँचने वाला, कभी श्रीकृष्ण की तरह सारथी, कभी श्रीराम की तरह खोया सम्मान लौटाने वाला और कभी जटायु की तरह प्राणों की बाजी लगाने वाला होता है।
मित्रता की महानता इस बात में नहीं कि हमने साथ कितने उत्सव मनाए, बल्कि इसमें है कि संकट आने पर हम एक-दूसरे के लिए कितनी शीघ्रता से खड़े हुए, कितना झुके और कितना त्याग किया।
सुख में जो मुस्काए, वह परिचित हो सकता है,दुःख में जो हाथ थामे, वही सच्चा मित्र होता है।

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