रक्षाबंधन मात्र पंचांग की एक तिथि नहीं; यह सनातन संस्कृति, अपनत्व, मर्यादा, अध्यात्म और पर्यावरण-संरक्षण की साझी विरासत का पावन अनुष्ठान है। वर्ष 2026 में यह महापर्व 28 अगस्त, शुक्रवार (श्रावण शुक्ल पूर्णिमा) को मनाया जाएगा।
‘रक्षा’ और ‘बंधन’ का यह शाश्वत मर्म किसी को बाँधने की सीमा नहीं, अपनों को बिखरने से बचाने का निःशब्द दायित्व है। राखी कलाई का शृंगार नहीं, संकट के हर मोड़ पर ढाल बनने का अटूट धर्म-संकल्प है।
किंतु इस पावन वेला में एक असहज यक्ष-प्रश्न हमारे अंतःकरण को झकझोरता है:
कलाई पर रक्षा-सूत्र की गाँठ तो हर वर्ष और पक्की हो रही है, मगर हृदयों की आत्मीय डोर इतनी कच्ची होकर क्यों टूट रही है?
1. कलाई बँधी, रिश्तों की डोर का क्या?
राखी की गाँठ कलाई तो बाँध देती है, लेकिन रिश्तों की खुलती गाँठ कौन बाँधेगा? उसके लिए अहंकार खोलना, मन जोड़ना और भावनाएँ बाँटना जरूरी है।
कहीं संपत्ति ने बचपन का आँगन बाँट दिया, कहीं तुलना ने अपनापन तौल दिया और कहीं एक कड़वा वाक्य वर्षों का मौन बन गया।
कभी एक मिठाई के लिए लड़ने वाले भाई बहन शाम को एक थाली में खाते थे। आज उनके सुख दुख की खबर भी अपनों से नहीं, किसी तीसरे से मिलती है।
बचपन में मन निर्मल था, इसलिए झगड़े सूर्यास्त से पहले मर जाते थे; आज अहंकार जीवित है, इसलिए रिश्ते मर रहे हैं।
संबंधों की अकाल मृत्यु यकायक नहीं होती। वे अनसुनी पुकारों, अवरुद्ध संवादों और दबे पाँव आती उपेक्षा के सन्नाटे में धीरे धीरे निर्वाण पा जाते हैं।
“झुके तो वह झुके”, इस मिथ्या स्वाभिमान की बलिवेदी पर रिश्ते असमय ढह रहे हैं।
धागा केवल कलाइयाँ जोड़ता है; रिश्तों के लिए हृदयों का झुकना जरूरी है।
कलाई पर धागा बाँधना परंपरा है; मन की गाँठ खोलकर रिश्ते बाँधना रक्षाबंधन है।
2. “पहले आप, पहले आप” में बूढ़े होते रिश्ते
रोटी, पढ़ाई और गृहस्थी ने भाई बहनों को अलग शहरों में बाँट दिया। भौतिक दूरी वक्त की मजबूरी थी, मगर दिलों की खाई हमारे अहंकार ने खोदी।
तकनीक ने दुनिया हथेली में समेट दी; चेहरे स्क्रीन पर दिखे, मगर अंतर्मन के रास्ते वीरान हो गए। दूर वाले स्क्रीन पर पास आ गए, लेकिन पास बैठे अपनों की खामोशी अनसुनी रह गई।
दोनों के फोन में नंबर और स्मृतियाँ मौजूद हैं; कमी बस उस एक उँगली की है, जो बरसों का मौन तोड़कर एक कॉल मिला दे।
“पहल वह करे”, इसी हठ में सावन बीतते रहे, कैलेंडर बदलते रहे और एक आँगन में पले रिश्ते बूढ़े होते चले गए। अपनों के आगे झुकने वाला कभी छोटा नहीं होता; वह अहंकार को हराकर अपना परिवार बचा लेता है।
कभी रक्षाबंधन ब्याहता बहन के मायके लौटने और बचपन को फिर से जीने का पर्व था। आज कई बहनों के लिए मायके की चौखट अपनत्व से अधिक औपचारिकता का द्वार बनती जा रही है। दूर हैं तो राखी के साथ आत्मीय शब्द भेजिए; पास हैं तो स्क्रीन हटाकर गले लगाइए।
“स्क्रीन केवल आवाज पहुँचा सकती है, आत्मीयता का स्पंदन किसी नेटवर्क से डाउनलोड नहीं होता।”
3. आधुनिकता की चमक में खोती विरासत
राखियाँ पहले से अधिक रंगीन हो गईं, लेकिन रिश्तों के रंग फीके पड़ते गए। मिठाइयाँ बढ़ीं, उपहार महँगे हुए और तस्वीरें सुंदर हुईं; बस साथ निभाने की भावना पीछे छूट गई।
रक्षा सूत्र बाँधते समय कहा जाता है:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी से तुम्हें बाँधता हूँ; हे रक्षे, तुम अडिग रहना।
धर्म ने धागे को शक्ति दी थी; हमने उसे धीरे धीरे केवल सजावट बना दिया।
लोक परंपरा के अनुसार द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की घायल उँगली पर अपनी साड़ी का छोर बाँधा था। श्रीकृष्ण ने चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर मर्यादा की दीवार खड़ी कर दी।
एक ने संकट देखकर हाथ बढ़ाया, दूसरे ने संकट आने पर रिश्ता निभाया।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ 12.13॥
अर्थात जो द्वेष से मुक्त, मैत्रीपूर्ण, करुणावान, अहंकाररहित और क्षमाशील है, वही भगवान को प्रिय है।
आज कलाई पर रक्षा सूत्र चमक रहा है, लेकिन मन में पुरानी शिकायतें सुरक्षित हैं। तस्वीर में मुस्कान है, लेकिन बातचीत में वर्षों का मौन है।
मन में द्वेष हो तो कलाई सज सकती है, रिश्ता नहीं।
आधुनिकता ने त्योहार का रूप चमका दिया, लेकिन उसकी आत्मा धुँधली कर दी।
रक्षा सूत्र कलाई बाँधने का धागा नहीं; मन की गाँठ खोलकर संबंध बचाने का संकल्प है।
4. आधुनिकता की होड़ में दिखावटी रिश्ते
हम चाँद की दूरी नाप आए और दुनिया हथेली में समेट ली; लेकिन भाई बहन के हृदय तक पहुँचने वाला छोटा सा रास्ता भूल गए। धरती छोटी हुई, दिलों की दूरी बड़ी हो गई।
पारिवारिक व्हाट्सएप समूह का नाम गर्व से “हम साथ साथ हैं” रखा जाता है। स्क्रीन पर परिवार पूरा है, वास्तविक जीवन में अपनापन अधूरा।
तैयार स्टीकर, दो लाल दिल और सूखा “सेम टू यू” भेजकर वर्ष भर का पारिवारिक धर्म पूरा मान लिया जाता है।
हमने अपनों को डिजिटल पिंजरे में सुरक्षित कर दिया, ताकि वास्तविक जीवन में उन्हें समय न देना पड़े।
बहन मीलों चलकर राखी बाँधने आई, मगर भाई स्क्रीन में खोया रहा। कलाई पास आई, राखी बँध गई, लेकिन रिश्ता अनछुआ रह गया। मिठाई मुँह तक पहुँची, पर मन की बात भीतर रह गई। तस्वीर खिंची, स्टेटस लगा और दुनिया ने प्रेम देख लिया; बस बहन अपने भाई का समय नहीं पा सकी।
रस्म पूरी हो गई, लेकिन मिलन अधूरा रह गया।
लाइक अंक है, स्नेह नहीं; इमोजी चमक है, धड़कन नहीं; ब्लू टिक संदेश पढ़ता है, मन नहीं; स्टेटस रिश्ता दिखाता है, निभाता नहीं; कॉपी पेस्ट शब्द पहुँचाता है, भावना नहीं; परिवार का समूह नाम जोड़ता है, दिल नहीं; सेल्फी मुस्कान कैद करती है, दर्द नहीं; वीडियो कॉल चेहरा दिखाती है, खामोशी नहीं पढ़ती।
“स्क्रीन पर रिश्ते दिखाना आसान है; अपनों के दर्द में ढाल बनकर खड़ा होना ही असली रक्षाबंधन है।”
5. महँगे होते उपहार, सस्ते होते और दम तोड़ते रिश्ते
आज कहीं कहीं रक्षाबंधन पर भावनाओं से अधिक दिखावा होने लगा है।
कभी बहन रेशम के धागे में दुआ बाँधकर भेजती थी; अब चाँदी और सोने की राखियों से प्रेम का मूल्य आँकने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। कुछ भाई बहन यह हिसाब लगाने लगते हैं कि क्या भेजा गया और बदले में कितना महँगा उपहार मिला।
राखी कलाई पर बाद में बँधती है, लेनदेन का हिसाब पहले खुल जाता है।
कहीं कोई भाई पैतृक संपत्ति में बहन का न्यायपूर्ण हिस्सा सहजता से स्वीकार नहीं करता, लेकिन रक्षाबंधन पर महँगी साड़ी या सोने की अँगूठी देकर अपने दायित्व की पूर्ति मान लेता है।
बहन का अधिकार रोककर दिया गया उपहार प्रेम नहीं, अधिकार के स्थान पर कृपा बाँटने जैसा है।
बाजार की चमक के बीच उपहारों के डिब्बे बड़े और भावनाओं के लिए जगह छोटी होती जा रही है। राखियाँ महँगी, संवाद छोटे और तस्वीरें रंगीन होती जा रही हैं; लेकिन कहीं कहीं संबंधों की आत्मीयता फीकी पड़ती दिखाई देती है। रिटर्न गिफ्ट तय हो रहे हैं, जबकि रिश्तों की जिम्मेदारियाँ अनिश्चित होती जा रही हैं।
सोने की राखी कलाई चमका सकती है, लेकिन कमजोर पड़ते रिश्ते को केवल सच्चा अपनापन ही बचा सकता है।
इसलिए उपहार की कीमत नहीं, रिश्ते का सम्मान बढ़ाइए; बहन को कृपा नहीं, उसका न्यायपूर्ण अधिकार और जीवन भर का सच्चा साथ दीजिए।
रक्षाबंधन का मूल्य इसमें नहीं कि क्या भेजा और क्या मिला; उसका मूल्य इसमें है कि कितना सम्मान दिया, कितना अधिकार बचाया और कितनी सच्चाई से रिश्ता निभाया।
6. धागे का अंतिम संकल्प: राखी की व्यथा, रिश्तों की पुकार
मानो राखी स्वयं पुकार रही हो:
“मुझे केवल कलाई की शोभा मत बनाओ; अपने आचरण में अपनाओ, व्यवहार में सजाओ और जिम्मेदारियों में निभाओ।”
रक्षाबंधन टूटे रिश्तों को अपने आप नहीं जोड़ता। त्योहार अवसर देता है, लेकिन दूरी घटाने, मौन मिटाने और अपनों को मनाने का पहला कदम हमें ही उठाना पड़ता है।
फोन कीजिए, मौन तोड़िए, शिकायत सुनिए, गलती स्वीकारिए और “कभी मिलेंगे” को एक वास्तविक तारीख दीजिए।
“हमारे बीच जो भी हुआ, उससे हमारा रिश्ता बड़ा है”, यह छोटा सा वाक्य वर्षों की नाराजगी पिघलाकर बंद दरवाजे पर पहली आत्मीय दस्तक बन सकता है।
राखी एक दिन की रस्म नहीं, वर्ष के 365 दिन निभाया जाने वाला कर्तव्य धर्म है।
क्षणभंगुर प्रदर्शन की चमक से बाहर निकलिए; अपनों के साथ प्रेम से जिया गया एक पल जीवन भर स्मृतियों में धड़कता है।
इस रक्षाबंधन अपनी आत्मा से पूछिए:
“क्या मैंने केवल कलाई पर धागा बाँधा है या दिलों की दूरी भी घटाई है? क्या मैंने सिर्फ रस्म निभाई है या रूठे अपने को मनाया है? क्या मैंने दुनिया को रिश्ता दिखाया है या सचमुच अपने रिश्तों को टूटने से बचाने का संकल्प लिया है?”
राखी की सफलता उसके रंग, मूल्य या तस्वीर से नहीं मापी जाएगी।
वह इस बात से मापी जाएगी कि धागा बँधने के बाद मौन कितना टूटा, मन कितना जुड़ा और दो हृदयों के बीच की दूरी कितनी घटी।
लेखक: ओम प्रकाश कसेरा

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