नज़रिया बदलिए, परिस्थितियाँ बदल जाएँगी

ओम प्रकाश कसेरा

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जीवन प्रबंधन की शुरुआत परिस्थितियों से नहीं, दृष्टि से होती है

दोस्तों, जीवन हर सुबह हमारे सामने केवल एक नई तारीख नहीं रखता, वह जिम्मेदारियों, संबंधों, अपेक्षाओं, संघर्षों, अभावों और अनिश्चितताओं का एक नया प्रश्नपत्र भी रख देता है।

हम चाहते हैं कि जीवन सीधी और समतल सड़क की तरह चले, लेकिन जीवन बार बार मोड़, चढ़ाई, गड्ढे और धुंध सामने रख देता है। ऐसे में प्रश्न यह होता है कि जो हो रहा है, उसे हम किस नज़रिए से देख रहे हैं ।


एक ही घटना किसी व्यक्ति को तोड़ देती है और किसी दूसरे को नई दिशा दे देती है। एक ही असफलता किसी के लिए अपनी क्षमता पर अंतिम निर्णय बन जाती है, जबकि किसी दूसरे के लिए वही तैयारी सुधारने का संकेत होती है। एक ही आलोचना किसी को अपमान लगती है और किसी को अपने भीतर झाँकने का अवसर। परिस्थितियाँ समान होते हुए भी परिणाम अलग क्यों होते हैं? क्योंकि प्रतिक्रिया केवल परिस्थिति से नहीं निकलती, वह परिस्थिति और नज़रिए के मिलन से जन्म लेती है।


“परिस्थितियाँ हमारे सामने प्रश्न रखती हैं, लेकिन उनका उत्तर हमारा नज़रिया लिखता है।”


सफलता केवल अवसर मिलने से नहीं आती। सफलता अवसर को पहचानने, उसका उपयोग करने और कठिन समय में भी प्रयास जारी रखने वाली दृष्टि से आती है। 


उसी प्रकार असफलता कई बार वह उस नज़रिए से आती है जो प्रयास से पहले ही हार स्वीकार कर लेता है, जो तुलना के कारण अपनी क्षमता को छोटा मान लेता है और जो एक असफल परिणाम को पूरे भविष्य का सत्य घोषित कर देता है।

प्रश्न यह नहीं कि सामने क्या है, प्रश्न यह है कि हम क्या देख रहे हैं


आधा भरा गिलास सामने रखा है। एक व्यक्ति उसकी खाली जगह देखकर दुखी है कि इतना कम क्यों मिला। दूसरा उसी गिलास में भरे पानी को देखकर सोचता है कि मेरे पास आगे बढ़ने के लिए अभी भी कुछ है। गिलास नहीं बदला, पानी की मात्रा नहीं बदली, लेकिन दोनों के भीतर पैदा होने वाली ऊर्जा बदल गई। पहला व्यक्ति शिकायत से भर गया, दूसरा कृतज्ञता और संभावना से। क्या इसका अर्थ यह है कि खाली हिस्सा दिखाई ही न दे? नहीं। संतुलित दृष्टि खाली हिस्से को भी देखती है, लेकिन भरे हिस्से की शक्ति को नष्ट नहीं होने देती।


रात दोनों के लिए एक जैसी होती है। किसी को केवल अंधकार दिखाई देता है, किसी को उसी अंधकार के पार आने वाला प्रकाश भी याद रहता है। अभाव दोनों के जीवन में हो सकता है। एक व्यक्ति केवल उन वस्तुओं की सूची बनाता है जो उसके पास नहीं हैं, दूसरा उन योग्यताओं, संबंधों, अनुभवों और अवसरों को पहचानता है जो उसे पहले से मिले हुए हैं। पहला अभाव गिनते गिनते निष्क्रिय हो जाता है, दूसरा उपलब्ध संसाधनों को जोड़कर अगला कदम उठाता है।


“अभाव जीवन को छोटा नहीं करता, अभाव के सामने झुकता हुआ नज़रिया जीवन को छोटा कर देता है।”


हम घटना से कम, उसकी अधूरी व्याख्या से अधिक परेशान होते हैं


हमारा मन खाली स्थान पसंद नहीं करता। जहाँ जानकारी पूरी नहीं होती, वहाँ वह अनुमान भर देता है। किसी का उत्तर देर से आया तो मन कहता है, वह हमें महत्व नहीं देता। किसी ने बैठक में कम बात की तो हम उसे घमंडी मान लेते हैं। किसी ने हमारी बात रोक दी तो हमें लगता है कि वह हमारे विरुद्ध है। क्या हमने उससे पूछा? क्या हमने परिस्थिति समझी? क्या हमने किसी दूसरी संभावना पर विचार किया? प्रायः नहीं। मन ने एक कहानी बनाई और हमने उसी कहानी को सत्य मान लिया।


यहीं से गलतफहमी जन्म लेती है। आँखें केवल दृश्य देखती हैं, लेकिन मन दृश्य के पीछे अपनी ओर से कारण जोड़ देता है। फिर कारण से भावना बनती है, भावना से प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया से संबंधों की दिशा बदल जाती है। कई बार सामने वाले ने अभी कुछ किया भी नहीं होता, लेकिन हमारे भीतर उसका मुकदमा पूरा हो चुका होता है। हमने प्रश्न पूछे बिना गवाही मान ली, तथ्य जाँचे बिना दोष तय कर दिया और पूरी बात सुने बिना फैसला सुना दिया।


“हर दिखाई देने वाला सत्य पूरा सत्य नहीं होता।”


इसे एक छोटे से प्रसंग से समझिए। दोपहर की तेज धूप थी। गला सूख रहा था, कपड़े पसीने से भीग चुके थे और आसपास पानी का कोई साधन दिखाई नहीं दे रहा था। आप थककर एक पेड़ की छाया में खड़े होते हैं। तभी सामने की इमारत की खिड़की खुलती है। एक व्यक्ति इशारे से पूछता है, पानी चाहिए? उस क्षण मन कहता है, दुनिया में अभी भी संवेदनशील लोग हैं। कितना अच्छा व्यक्ति है।

वह नीचे आने का संकेत देता है और खिड़की बंद कर देता है। पाँच मिनट बीतते हैं, फिर दस और अब पंद्रह मिनट हो चुके हैं, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता। सूखा गला और बढ़ती बेचैनी मन की भाषा बदल देते हैं। वही व्यक्ति अब लापरवाह दिखाई देने लगता है। मन भीतर ही भीतर कहता है, सहायता करनी नहीं थी तो आशा क्यों जगाई? पहली राय टूटती है और दूसरी राय बन जाती है।

सोलहवें मिनट दरवाज़ा खुलता है। वह व्यक्ति क्षमा माँगते हुए कहता है कि आपकी हालत देखकर केवल पानी देना ठीक नहीं लगा, इसलिए नींबू पानी बना रहा था। आपके भीतर का निर्णय फिर बदल जाता है। नहीं, यह तो वास्तव में बहुत अच्छा इंसान है। आप गिलास उठाते हैं और पहला घूँट लेते हैं, लेकिन उसमें चीनी नहीं है। मन फिर शिकायत करता है, इतनी देर लगाई और नींबू पानी भी ठीक से नहीं बनाया।

तभी वह मुस्कराकर ऑरेंज ग्लूकोज का पाउच आगे कर देता है। कहता है, मुझे नहीं मालूम कि आप कितनी मिठास पसंद करते हैं और स्वास्थ्य के कारण चीनी से कोई परहेज तो नहीं, इसलिए अपने स्वाद के अनुसार मिला लीजिए। अब पाँचवीं बार आपकी राय बदलती है। व्यक्ति वही था, उसकी नीयत वही थी और घटना भी वही थी। हर बार बदल रही थी केवल हमारी जानकारी और उस अधूरी जानकारी से बनी धारणा।

“एक गिलास पर हमारी राय पाँच बार बदल सकती है, तो किसी मनुष्य के चरित्र पर पाँच मिनट में दिया गया फैसला कितना सही होगा?”


हम अक्सर सत्य का मूल्यांकन नहीं करते, हम अपनी अपेक्षाओं का प्रतिबिंब देखते हैं। 

अधूरी जानकारी और आवेगपूर्ण निर्णय की कीमत

हर गलतफहमी नींबू पानी की घटना जितनी सस्ती नहीं होती। कहीं हमारी राय बदलती है और बात समाप्त हो जाती है, लेकिन कहीं आवेग में लिया गया निर्णय ऐसा नुकसान कर देता है जिसे पश्चाताप भी वापस नहीं ला सकता। क्रोध का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि वह हमें कुछ समय के लिए अस्थिर करता है। उसका बड़ा खतरा यह है कि वह अधूरी जानकारी को पूरा सत्य मानकर तुरंत कार्रवाई करवा देता है।


नेवले और बच्चे की प्रसिद्ध लोककथा इसी जल्दबाजी का मार्मिक दर्पण है। घर का स्वामी लौटता है और दरवाज़े पर अपने वफादार नेवले के मुँह पर रक्त देखता है। बस एक दृश्य। न कोई प्रश्न, न कोई जाँच और न सत्य जानने की प्रतीक्षा। भय तुरंत क्रोध बनता है और क्रोध फैसला सुना देता है कि नेवले ने बच्चे को मार दिया। वह उसी क्षण उस वफादार प्राणी को मार देता है।

अंदर पहुँचकर जो दृश्य दिखाई देता है, वह उसके भीतर सब कुछ तोड़ देता है। बच्चा सुरक्षित था और पास में मरा हुआ साँप पड़ा था। नेवले के मुँह पर लगा रक्त अपराध का नहीं, उसकी बहादुरी का प्रमाण था। उसने बच्चे की जान बचाई थी, लेकिन उसे धन्यवाद के स्थान पर मृत्यु मिली। अब स्वामी रो सकता था, पश्चाताप कर सकता था और स्वयं को दोष दे सकता था, लेकिन अपना निर्णय वापस नहीं ले सकता था।

“सत्य देर से आया, लेकिन तब तक क्रोध अपना काम कर चुका था।”


नेवले ने बच्चे को मार दिया, यह अनुमान था। हमारी भूल तब होती है जब हम तथ्य और अनुमान के बीच का अंतर मिटा देते हैं। जीवन प्रबंधन का विवेक इसी अंतर को पहचानने से शुरू होता है।

एक दूसरी कथा इस विचार को संबंधों के स्तर पर और गहरा करती है। नदी किनारे खड़ा पेड़ चिड़िया से कहता है कि वह कहीं और घोंसला बनाए। चिड़िया इसे घमंड और अस्वीकृति समझती है। कुछ समय बाद नदी की मिट्टी बह जाती है, जड़ें कमजोर पड़ती हैं और पेड़ पानी में गिर जाता है। चिड़िया ताना देती है कि उसे अपने व्यवहार का फल मिल गया। तब पेड़ बताता है कि उसे अपनी कमजोर जड़ों का आभास था। उसने चिड़िया को दूर इसलिए भेजा था, ताकि उसके गिरने पर घोंसला और बच्चे नष्ट न हों।

हर इंकार अपमान नहीं होता। हर दूरी बेरुखी नहीं होती। हर टोकना विरोध नहीं होता। कभी कभी कठोर शब्दों के पीछे ऐसी चिंता छिपी होती है जिसकी जानकारी हमें नहीं होती। क्या हम सामने वाले की भाषा से आगे उसकी परिस्थिति को समझने का प्रयास करते हैं? क्या हम पूछते हैं कि उसने ऐसा क्यों कहा? या हम अपने पुराने अनुभवों से अर्थ बनाकर संबंध तोड़ देते हैं?

“प्रतिक्रिया से पहले प्रश्न, क्रोध से पहले जाँच और निर्णय से पहले पूरी बात, कई संबंधों को टूटने से बचा सकती है।”


उधार के निष्कर्षों पर अपना जीवन मत चलाइए

हम दूसरों की नकल केवल कपड़ों, भाषा और जीवनशैली में नहीं करते। हम उनके निष्कर्ष भी उधार ले लेते हैं। किसी ने किसी व्यक्ति को गलत कहा और हमने मान लिया। किसी ने किसी काम को असंभव कहा और हमने प्रयास छोड़ दिया। किसी ने किसी अवसर को बेकार बताया और हमने स्वयं जाँचे बिना दरवाज़ा बंद कर दिया। क्या यह विवेक है, या अपने निर्णय का अधिकार किसी और को सौंप देना है?

हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, क्षमता, अनुभव, आवश्यकता और लक्ष्य अलग होते हैं। जो रणनीति किसी एक व्यक्ति के लिए सफल रही, वह दूसरे के लिए वैसी ही सफल हो, यह आवश्यक नहीं। उसी प्रकार किसी दूसरे की असफलता हमारे लिए भी असफलता की गारंटी नहीं है। फिर हम क्यों लोगों की राय को तथ्य और उनके भय को अपनी सीमा बना लेते हैं? क्यों हम स्वयं अनुभव किए बिना ही स्वाद का निर्णय कर लेते हैं?

एक बड़ी कंपनी मानव संसाधन विभाग के लिए चयन कर रही थी। अंतिम उम्मीदवार को मुख्य कार्यपालन अधिकारी के साथ भोजन के लिए बुलाया गया। भोजन से पहले सूप आया। अधिकारी ने सूप चखा और उसमें नमक तथा काली मिर्च डाली। उम्मीदवार ने उन्हें देखा और बिना चखे अपने सूप में भी नमक और काली मिर्च मिला दी। उसे लगा होगा कि उसने वरिष्ठ अधिकारी की पसंद समझकर अपनी समझदारी दिखा दी है।

भोजन समाप्त हुआ, लेकिन उसे नियुक्ति पत्र नहीं मिला। अधिकारी का तर्क था कि जिसने सूप का स्वाद जाने बिना दूसरे की नकल करके निर्णय ले लिया, वह काम में भी तथ्य जाने बिना धारणा बना सकता है। बात नमक की नहीं थी, निर्णय लेने की आदत की थी। वह छोटा व्यवहार बता रहा था कि उम्मीदवार अपनी समझ पर कितना भरोसा करता है और परिस्थिति को स्वयं जाँचने का धैर्य रखता है या नहीं।

“दूसरों का सूप देखकर अपने जीवन में नमक मत डालिए। पहले अपना अनुभव चखिए।”


वास्तव में स्वतंत्र नज़रिया जिद नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरों की सलाह कभी न सुनें। इसका अर्थ है कि सलाह को समझें । सही नज़रिया केवल सकारात्मक सोच नहीं, तथ्यपूर्ण और स्वतंत्र सोच भी है। 

जब पूरी दुनिया गलत लगे, अपने चश्मे को भी जाँचिए


दूसरों की गलती देखना सरल है, अपनी दृष्टि की सीमा देखना कठिन। जब बार बार संबंध बिगड़ें, हर सलाह अपमान लगे, हर व्यक्ति स्वार्थी दिखाई दे और हर नई परिस्थिति खतरा लगे, तब क्या हर बार दुनिया ही गलत है? संभव है कि दुनिया के कुछ हिस्से गलत हों, लेकिन क्या यह भी संभव है कि हमारे भीतर का कोई पुराना घाव वर्तमान को प्रभावित कर रहा हो?

एक टिकट निरीक्षक चार्ट देखकर नौ यात्रियों से कहता है कि वे गलत ट्रेन में बैठे हैं। यात्री घबरा जाते हैं। थोड़ी देर बाद पता चलता है कि नौ यात्री गलत ट्रेन में नहीं थे, स्वयं निरीक्षक गलत ट्रेन में आ गया था। जब हमें एक साथ बहुत सारे लोग गलत दिखाई दें, तब एक बार अपना स्थान और अपना चार्ट भी जाँच लेना चाहिए।

शरीर की एक उँगली घायल हो और उसी उँगली से हम सिर, कंधे, घुटने और पैर को छुएँ तो हर अंग में दर्द महसूस होगा। हम कह सकते हैं कि पूरा शरीर दुख रहा है, जबकि समस्या पूरे शरीर में नहीं, जाँचने वाली उँगली में है। इसी तरह मन में अविश्वास की चोट हो तो हर व्यक्ति संदिग्ध दिखता है। अहंकार घायल हो तो हर सुझाव अपमान लगता है। पिछली असफलता का घाव हो तो हर नया अवसर खतरा दिखाई देता है।

“कहीं ऐसा तो नहीं कि आप पुराने घाव वाली उँगली से पूरे संसार को छू रहे हैं और फिर कह रहे हैं कि हर जगह दर्द है?”


जिसने एक प्रयास में असफलता देखी हो, उसका भय समझा जा सकता है। लेकिन यदि वही भय हर नए अवसर का दरवाज़ा बंद कर दे तो असफलता एक घटना नहीं रहती, वह स्थायी नज़रिया बन जाती है।


जिस दिन हम अपने चश्मे को जाँचने लगते हैं, उसी दिन दूसरों को दोष देने की आवश्यकता कम होने लगती है।

अभाव में संभावना देखना कल्पना नहीं, नेतृत्व है


नज़रिया जादू नहीं करता, लेकिन वह हमारे ध्यान की दिशा बदलता है। ध्यान बदलता है तो प्रश्न बदलते हैं। प्रश्न बदलते हैं तो विकल्प दिखाई देते हैं और विकल्प दिखाई दें तो कर्म की संभावना जन्म लेती है।


जूते की कंपनी वाली लोकप्रिय कथा में दो प्रतिनिधि ऐसे गाँव में पहुँचते हैं जहाँ कोई व्यक्ति जूता नहीं पहनता। पहला प्रतिनिधि निराश होकर संदेश भेजता है कि यहाँ बाजार शून्य है, क्योंकि कोई जूता पहनता ही नहीं। दूसरे प्रतिनिधि की आँखों में वही दृश्य एक विशाल संभावना बन जाता है। वह लिखता है कि यहाँ बाजार असाधारण है, क्योंकि अभी किसी के पास जूता नहीं है।


गाँव वही था, लोग वही थे और तथ्य भी वही थे। अंतर केवल देखने वाले मन में था। एक ने वर्तमान अनुपस्थिति को स्थायी असंभवता मान लिया। दूसरे ने उसी अनुपस्थिति को भविष्य की आवश्यकता समझा। पहला परिस्थिति का अंत देख रहा था, दूसरा उसी स्थान पर शुरुआत देख रहा था। पहले का प्रश्न था, यहाँ कोई जूता पहनता ही नहीं, फिर बेचेंगे कैसे? दूसरे का प्रश्न था, यदि किसी के पास जूता नहीं है तो आवश्यकता समझाकर कितने लोगों तक पहुँचा जा सकता है?

“जहाँ एक व्यक्ति ने शून्य देखकर वापसी चुनी, वहीं दूसरे ने शून्य में भविष्य लिख दिया।”


घटना बदलना हर बार हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उसका अर्थ और अपना उत्तर चुनना हमारे हाथ में होता है।

नज़रिया केवल सोच नहीं, व्यवहार और चरित्र भी है


हम अक्सर नज़रिए को केवल सफलता और अवसर से जोड़ते हैं, लेकिन हमारा नज़रिया यह भी तय करता है कि हम लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। सुंदर स्मृति बनने के लिए चेहरा नहीं, चरित्र चाहिए। 


एक प्रवचन की कथा में गुरु युवक से पूछते हैं कि रास्ते में दिखा सुंदर चेहरा उसे कितनी देर याद रहेगा। युवक कहता है, कुछ मिनट, शायद तब तक जब तक कोई दूसरा आकर्षक चेहरा न दिख जाए।


गुरु फिर एक धनी व्यक्ति का उदाहरण देते हैं। वह पैकेट लेने किसी कर्मचारी को भेजने के बजाय स्वयं बाहर आता है। अतिथि को सम्मान से भीतर बुलाता है, भोजन कराता है, वाहन से गंतव्य तक पहुँचाता है और बाद में फोन करके उसकी कुशलता पूछता है। गुरु पूछते हैं, ऐसा व्यवहार कितनी देर याद रहेगा? युवक कहता है, जीवन भर। बाहरी आकर्षण आँखों को कुछ समय बाँधता है, लेकिन सम्मान, करुणा और विनम्रता हृदय में स्थायी स्थान बनाते हैं।


जब हम पहचानते हैं कि सम्मान की आवश्यकता केवल हमें नहीं, सामने वाले को भी है, तब संबंधों में गर्माहट आती है। 

अब निर्णय आपका है


आज आपके सामने भी कोई व्यक्ति, परिस्थिति या असफलता खड़ी होगी जिसके बारे में आपने अंतिम राय बना ली है। एक बार ठहरिए। पूरी कहानी सुनिए। अपने सूप का स्वाद स्वयं चखिए। अपनी घायल उँगली पहचानिए। अपना चार्ट और अपनी ट्रेन भी जाँचिए। संभव है कि दुनिया उतनी कठोर न हो जितनी पुराने अनुभवों के चश्मे से दिखाई दे रही है। संभव है कि जिस शून्य को आप अंत समझ रहे हैं, वही भविष्य लिखने के लिए खाली स्थान हो।


इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति सही है, हर घटना अच्छी है या हर खतरे को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि निर्णय भय, क्रोध, नकल और अधूरी जानकारी से नहीं, तथ्य, धैर्य, विवेक और मानवीय संवेदना से लिया जाए। 


आज से एक छोटा संकल्प कीजिए। राय बनाने से पहले पूरी बात सुनेंगे। प्रतिक्रिया देने से पहले एक प्रश्न पूछेंगे। दूसरों का सूप देखकर अपने जीवन में नमक नहीं डालेंगे। पूरी दुनिया को गलत कहने से पहले अपना चश्मा जाँचेंगे। कठिन परिस्थिति में केवल कमी नहीं, संभावना भी खोजेंगे। और वातावरण जैसा भी हो, अपने व्यवहार की सुंदरता और मनुष्यता को बचाए रखेंगे।


दुनिया बदलने की जिद से पहले अपना नज़रिया बदलिए। नज़रिया बदलेगा तो केवल दृश्य नहीं बदलेगा, आपके प्रश्न बदलेंगे, निर्णय बदलेंगे, संबंध बदलेंगे, अवसर बदलेंगे और धीरे धीरे आपका जीवन अपनी नई कहानी लिखना शुरू कर देगा।




लेखक: ओम प्रकाश कसेरा

ओम प्रकाश कसेरा पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक तथा सामाजिक और प्रेरक विषयों के लेखक हैं। मानवीय संबंधों, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।