चुनौती से संकल्प, संकल्प से साधना, साधना से सफलता तक की

जीवन प्रबंधन की प्रेरक यात्राएँ.....

दोस्तो, चुनौती जीवन का आकर्षण है। जिस जीवन में कोई चुनौती नहीं, कोई कमी नहीं और किसी बेहतर स्थिति की बेचैनी नहीं, वहाँ प्रयास की तीव्रता भी धीरे धीरे कम होने लगती है।

मनुष्य अक्सर उसी कमी को दूर करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाता है, जिसे वह भीतर तक अनुभव करता है। इसीलिए सफल लोगों में उन व्यक्तियों का प्रतिशत अधिक दिखाई देता है, जो किसी काम को केवल करना नहीं चाहते, बल्कि उसे दिल से करना चाहते हैं। 

इच्छा जब सुविधा भर होती है तो थोड़ी कठिनाई में बदल जाती है, लेकिन इच्छा जब संकल्प बनकर हृदय में उतर जाती है, तब रास्ते की बाधाएँ भी उसे रोक नहीं पातीं।

हम सामान्य बातचीत में कहते हैं, “अरे, यह बात मेरे दिमाग से उतर गई थी।” लेकिन जब कोई घटना हमें भीतर तक छू जाती है तो हम कहते हैं, “उसकी बात मेरे दिल में लग गई।” दिमाग में आई बात दूसरी सूचना के आते ही धुँधली हो सकती है, पर दिल में लगी बात वर्षों तक स्मृति में जीवित रहती है। 

दिल में लगी चोट मनुष्य को बेचैन करती है और दिल में लगी आग उसे लगातार याद दिलाती है कि अभी कुछ बदलना बाकी है। इसी आग से लक्ष्य जन्म लेता है। 

आवश्यकता को आविष्कार की जननी कहा गया है, क्योंकि अभाव केवल पीड़ा नहीं देता, वह समाधान खोजने की प्रेरणा भी देता है। अभाव को मिटाना लक्ष्य बनता है, लक्ष्य प्रेरणा देता है और प्रेरणा मनुष्य से कहती रहती है कि प्रयास तब तक समाप्त नहीं होगा, जब तक सफलता नहीं मिलेगी।

ऊँचाई का सपना और पड़ावों का सत्य

हर व्यक्ति नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करना चाहता है। उसका क्षेत्र विज्ञान हो सकता है, शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय, चिकित्सा, राजनीति, कला या समाज सेवा। लेकिन कोई ऊँची चोटी एक रात में नहीं मिलती। पहाड़ की लंबी चढ़ाई में पर्वतारोही कई पड़ाव लेते हैं। वे वहाँ अपने शरीर को विश्राम देते हैं, ऊर्जा लौटाते हैं, दिशा जाँचते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं। उस पड़ाव तक आने में मिली कठिनाइयाँ उनकी हार नहीं होतीं, वे उनका अनुभव बनती हैं। वही अनुभव आगे की कठिन चढ़ाई में मार्गदर्शक बनता है।

जीवन में भी पद, परीक्षा, परियोजना, व्यवसाय या साधना का प्रत्येक छोटा परिणाम एक पड़ाव है, अंतिम मंजिल नहीं। पड़ाव पर रुककर स्वयं को तरोताजा करना बुद्धिमानी है, लेकिन वहीं संतुष्ट होकर बैठ जाना विकास को रोक देता है। 

चोटी पर वही पहुँचता है जो विश्राम और विराम का अंतर समझता है। विश्राम शक्ति लौटाता है, जबकि स्थायी विराम लक्ष्य से दूर कर देता है। बार बार पीछे देखने वाला व्यक्ति न तो चोटी तक पहुँच पाता है, न सहजता से धरातल पर लौट पाता है। उसकी स्थिति उस कहावत जैसी हो जाती है, “न माया मिली, न राम।” इसलिए अतीत से शिक्षा लीजिए, पर यात्रा की दिशा आगे रखिए।

लक्ष्य से पहले लक्ष्य की भूख चाहिए

बिना भूख के छप्पन भोग भी खट्टी डकार दे सकते हैं और तीखी भूख हो तो साधारण भोजन भी अमृत लगता है। यही बात लक्ष्य पर लागू होती है। संसाधन, सलाह, प्रशिक्षण और अवसर तभी उपयोगी होते हैं, जब भीतर लक्ष्य की भूख हो। जो व्यक्ति केवल सफलता का दृश्य चाहता है, लेकिन उसके लिए आवश्यक परिश्रम नहीं, वह इच्छा पालता है, लक्ष्य नहीं। लक्ष्य की भूख आपको सुबह उठाती है, असफलता के बाद दोबारा बैठाती है, आलोचना के बीच अभ्यास कराती है और आराम के आकर्षण से बचाती है।

अपने सपने ऐसी जगह लिखिए जहाँ वे बार बार दिखाई दें, चाहे अध्ययन कक्ष हो, कार्यस्थल हो या घर का कोई निजी कोना। इसका अर्थ दीवारों को शब्दों से भर देना नहीं, बल्कि लक्ष्य को दृष्टि से ओझल न होने देना है। जिस लक्ष्य को हम रोज देखते, पढ़ते और उसके लिए कुछ करते हैं, वह कल्पना से योजना और योजना से आदत बनने लगता है। 

सपने की याद तभी सार्थक है, जब उसके साथ आज का काम भी लिखा हो। केवल “मुझे सफल होना है” लिखना अधूरा है। उसके नीचे यह लिखना अधिक उपयोगी है कि आज सफलता की दिशा में कौन सा एक काम पूरा करना है।

दिल में उतरा संकल्प परिस्थितियों से बड़ा होता है

तमिलनाडु की एन. अंबिका की जीवनयात्रा इसी संकल्प का शक्तिशाली उदाहरण है। कम आयु में उनका विवाह एक पुलिस कॉन्स्टेबल से हुआ और अठारह वर्ष की आयु तक वे दो बच्चों की माँ बन चुकी थीं। एक गणतंत्र दिवस समारोह में उन्होंने अपने पति को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सलाम करते देखा। जब उन्हें पता चला कि वे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं, तब उनके भीतर भी अधिकारी बनने का संकल्प जागा। उस समय उनकी औपचारिक शिक्षा भी पूरी नहीं थी। उन्होंने पहले दसवीं, फिर बारहवीं और स्नातक की पढ़ाई पूरी की। तैयारी के लिए चेन्नई जाना पड़ा, जबकि उनके पति ने नौकरी के साथ बच्चों की जिम्मेदारी संभाली। वे सिविल सेवा परीक्षा में तीन बार असफल हुईं। परिवार की व्यावहारिक चिंता स्वाभाविक थी, फिर भी उन्होंने एक अंतिम अवसर माँगा। चौथे प्रयास में वर्ष 2008 में सफलता प्राप्त कर वे भारतीय पुलिस सेवा में पहुँचीं। उनकी कहानी बताती है कि मजबूत इरादा कठिन परिस्थिति को तुरंत समाप्त नहीं करता, लेकिन व्यक्ति को परिस्थिति से बड़ा अवश्य बना देता है।

दशरथ मांझी के सामने पहाड़ था। पत्नी की पीड़ा ने उनके भीतर ऐसी चिंगारी जलाई कि वर्षों तक वे उसी एक उद्देश्य में लगे रहे और पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। इस कथा की शक्ति केवल असाधारण श्रम में नहीं, एकाग्रता में है। 

वे रोज नया लक्ष्य बदलते तो कोई रास्ता नहीं बनता। तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन की साधना से जुड़ा एक प्रचलित प्रसंग भी यही कहता है कि उन्होंने कठिन अभ्यास के दौरान तबला छोड़कर कभी सारंगी, कभी हारमोनियम चुनने की बेचैनी नहीं पाली। 

हाथों में पीड़ा के बावजूद अभ्यास जारी रखने की यह छवि हमें बताती है कि उत्कृष्टता बार बार साधन बदलने से नहीं, चुने हुए साधन में गहराई तक उतरने से आती है।

काली रात स्थायी नहीं होती

सुबह होने से पहले रात सबसे अधिक काली प्रतीत हो सकती है, लेकिन कोई रात सदा रात नहीं रहती। उसके बाद सूर्योदय होता है, फूल खिलते हैं, हवा में ताजगी आती है और जीवन फिर गति पकड़ता है। दुःख भी ऐसा ही है। वह आता है, कुछ समय ठहरता है, हमारी परीक्षा लेता है और फिर बदलता है। कठिन समय में हमारी सबसे बड़ी भूल यह मान लेना है कि आज की स्थिति ही भविष्य का अंतिम सत्य है।

नमक को पहले छोटे गिलास में घोलते हैं। पानी अत्यंत खारा हो जाता है। फिर उतना ही नमक एक बड़ी झील में डालते हैं, पर झील का जल अपनी विशालता के कारण पीने योग्य रहता है।

दुःख नमक की तरह सीमित हो सकता है, लेकिन यदि हम अपने जीवन की सारी खुशी, रिश्ते, उपलब्धियाँ, अवसर और संभावनाएँ भूलकर केवल उसी दुःख को छोटे गिलास में बंद कर दें तो जीवन कड़वा लगेगा। 

दृष्टि को झील जितना व्यापक कीजिए। अंधकार कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं, वह प्रकाश का अभाव है। उसी प्रकार नकारात्मकता को हटाने का सबसे व्यावहारिक उपाय सकारात्मक कर्म, सार्थक संगति और उद्देश्य का प्रकाश बढ़ाना है।

मंजिल पर ही नहीं, यात्रा में भी प्रसन्न रहिए

जब हम यात्रा पर निकलते हैं तो तैयारी से लेकर रास्ते, गंतव्य और वापस आने तक कई क्षणों में आनंद लेते हैं। लेकिन लक्ष्य तय करते समय हम अक्सर अपनी सारी खुशी भविष्य की एक तारीख पर रख देते हैं। हम सोचते हैं कि परीक्षा पास होने, पद मिलने, व्यवसाय चलने या पुस्तक पूरी होने के बाद ही प्रसन्न होंगे। यह सोच यात्रा को बोझ बना देती है। हर छोटे परिणाम पर अहंकार नहीं, स्वस्थ प्रसन्नता होनी चाहिए। पहला अध्याय पूरा हुआ, पहली आदत बनी, पहली असफलता से सीख मिली, पहला ग्राहक संतुष्ट हुआ, यह सब ऊर्जा देने वाले पड़ाव हैं।

सफलता का अर्थ केवल सबसे ऊँची चोटी पर खड़ा होना नहीं है। सफलता यह भी है कि आपने अभाव को बहाना नहीं बनने दिया, दिल में लगी बात को आग बनाया, लक्ष्य की भूख जगाई, पड़ावों से अनुभव लिया और हर दिन आगे बढ़ते रहे। चुनौती से मत भागिए। संभव है वही चुनौती आपके जीवन की दिशा बदलने आई हो। याद रखिए, “अभाव जब आत्मविश्वास से मिलता है, तब शिकायत नहीं, संभावना जन्म लेती है।”

अभाव जब तक सीने में चुभता है, तब तक सिर्फ दर्द देता है; लेकिन जिस पल वह संकल्प बनकर जागता है, इतिहास रच देता है। परिस्थितियाँ आपको तोड़ेंगी नहीं, यदि आपके भीतर लक्ष्य की भूख जीवित है। दुनिया आपके बहानों का नहीं, आपके बुलंद हौसलों का हिसाब रखेगी। इसलिए अपनी कमियों को रोना मत बनाइए, उन्हें अपनी सबसे बड़ी ताक़त बनाकर मैदान में उतरिए क्योंकि चोट जब दिल पर लगती है, तभी इंसान असाधारण बनता है।

हालात की औकात नहीं कि वह आपके संकल्प को झुका सके! जब तक सीने में लगी आग जिंदा है, तब तक कोई भी पहाड़ आपको रास्ता बनाने से नहीं रोक सकता। लाचार लोग दर्द का रोना रोते हैं, और सिरफिरे उसी दर्द को अपनी जीत का हथियार बना लेते हैं। रोना बंद कीजिए, उठिए और अपनी ज़िद से दुनिया को अपनी तकदीर लिखने पर मजबूर कर दीजिए।

ओम प्रकाश कसेरा पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक तथा सामाजिक और प्रेरक विषयों के लेखक हैं। मानवीय संबंधों, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है