दोस्तों, आज 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी प्रातः लगभग 2 बजकर 25 मिनट से प्रारंभ होकर 5 सितंबर को रात्रि 12 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी।
हम श्रीकृष्ण का जन्म तो हर वर्ष बड़े उत्साह से मनाते हैं, लेकिन एक प्रश्न है, श्रीकृष्ण के विचारों का जन्म हमारे भीतर कब होगा? उनके विवेक, उनके साहस, उनकी करुणा और उनके दिए हुए कर्तव्य ज्ञान का बोध हमें कब होगा?
ये वही श्रीकृष्ण हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, फिर भी गरीब ब्राह्मण सुदामा के चरण धोते हैं। सृष्टि जिनके प्रताप से चलती है, वे अर्जुन का रथ चला रहे हैं। जिनके लिए संसार में कुछ भी अप्राप्त नहीं, वे स्वयं शांति दूत बनकर न्याय माँग रहे हैं। जो अखिल ब्रह्मांड के स्वामी हैं, वे युद्ध रोकने के लिए केवल पाँच गाँव माँग रहे हैं। जो परमपिता हैं, ब्रह्म हैं, गुरु हैं, वही आवश्यकता पड़ने पर शिष्य की तरह सेवा भी कर रहे हैं। जो समस्त संसार के पालनकर्ता हैं, वे यशोदा मैया के पालने में बालक बनकर खेल रहे हैं।
जरा ठहरकर सोचिए, सामर्थ्य इतना कि पूरा संसार चरणों में झुक जाए, लेकिन अहंकार इतना भी नहीं कि किसी गरीब मित्र के सामने दूरी बना लें। उनका हृदय कितना कोमल, स्वभाव कितना सरल और व्यक्तित्व कितना अहंकार शून्य है। वे गोपियों के साथ खेलते हैं, ग्वाल बालों से हार जाते हैं और सुदामा के आने का समाचार मिलते ही राजमहल की मर्यादा भूलकर प्रेम और वात्सल्य में नंगे पाँव दौड़ पड़ते हैं।
शायद इसीलिए श्रीकृष्ण को केवल मंदिरों में खोजना पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपने भीतर जगाना भी होगा। जन्माष्टमी केवल यह याद करने का दिन नहीं कि श्रीकृष्ण कब जन्मे थे, यह स्वयं से पूछने का दिन भी है कि श्रीकृष्ण का विवेक, साहस, करुणा और कर्तव्य हमारे भीतर कब जन्म लेंगे?
क्योंकि एक तरफ श्रीकृष्ण हैं और दूसरी तरफ हम हैं।
जरा सी चाय ठंडी हुई, तो लगता है भाग्य ने हमारे विरुद्ध षड्यंत्र कर दिया। किसी संदेश का उत्तर देर से आया, तो मन के भीतर महाभारत शुरू। दोस्त ने नई गाड़ी खरीद ली, तो भीतर ईर्ष्या का अग्निकुंड जल उठा। किसी परिचित की प्रगति हो गई, तो उसकी सफलता से अधिक हमें अपना दुर्भाग्य दिखाई देने लगता है।
मोबाइल का नेटवर्क गया, तो धैर्य भी नेटवर्क से बाहर। सोशल मीडिया पर किसी का अच्छा जीवन दिख गया, तो अपना नसीब खराब लगने लगा। किसी और की तारीफ हुई, तो हमारे स्वाभिमान को चोट लग गई। ट्रैफिक में पाँच मिनट रुकना पड़ा, तो लगता है जैसे नियति ने व्यक्तिगत रूप से हमारे साथ अन्याय कर दिया हो। मनपसंद भोजन न मिला, तो पूरा दिन खराब घोषित।
कितना विचित्र है, हमारे पास बहुत कुछ है, फिर भी मन उस एक चीज का हिसाब रखता है जो हमारे पास नहीं है। छोटी सी असुविधा को हम त्रासदी बना लेते हैं और छोटी सी तुलना को अपने सुख का सबसे बड़ा शत्रु। शायद हमारे दुख का कारण हमेशा अभाव नहीं होता, कभी कभी दूसरों से तुलना भी हमारे सुख को चुपचाप खा जाती है।
दोस्तों, युग बदल गया है, लेकिन मनुष्य का संघर्ष कहाँ बदला है? हजारों वर्ष पहले कुरुक्षेत्र में दिया गया श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश आज भी हमारे यथार्थ जीवन में उतना ही जीवंत है जितना उस समय था।
अंतर केवल इतना है कि आज हमारे हाथ में गांडीव नहीं है, लेकिन हमारा कुरुक्षेत्र किसी भी तरह छोटा नहीं हुआ है। कहीं नौकरी की अस्थिरता है, कहीं व्यवसाय में घाटा। कभी कर्ज का बढ़ता बोझ है, कभी बीमारी से जूझता शरीर। कहीं टूटते संबंध हैं, कहीं बच्चों के भविष्य की चिंता। कभी बेरोजगारी है, कभी वर्षों से रुकी पदोन्नति। कभी काम और परिवार के बीच संतुलन की लड़ाई है, कभी मोबाइल में भटकता ध्यान और कभी परिस्थितियों के बीच खोता हुआ आत्मसम्मान।
कुरुक्षेत्र आज भी है, बस उसका भूगोल बदल गया है।
आज वह हमारे घर में है, कार्यस्थल पर है, संबंधों में है और सबसे बढ़कर हमारे मन के भीतर है। हमारे भीतर भी एक दुर्योधन बार बार खड़ा होता है। कभी वह डर बनकर सामने आता है, कभी चिंता बनकर, कभी क्रोध, कभी आलस्य और कभी आत्मसंदेह बनकर। कई बार हमारा सबसे बड़ा शत्रु सामने खड़ा व्यक्ति नहीं होता, वह हमारे अपने मन के भीतर बैठा होता है।
और शायद इसीलिए आज हमें श्रीकृष्ण की आवश्यकता केवल पूजा के लिए नहीं, जीवन के लिए भी है।
इस जन्माष्टमी प्रश्न यह नहीं कि हमने कितनी सुंदर झाँकी सजाई, कितने भजन सुने या कितनी श्रद्धा से जन्मोत्सव मनाया। बड़ा प्रश्न यह है कि जब जीवन हमारा अपना कुरुक्षेत्र सामने खड़ा करेगा, तब हम क्या करेंगे? क्या परिस्थितियों के सामने गांडीव रख देंगे, या अपने कर्तव्य मार्ग पर टिके रहेंगे? क्या हम श्रीकृष्ण के संदेशों को केवल सुनेंगे, या निर्णय की घड़ी आने पर उन्हें जीवन में उतारेंगे भी?
हमें श्रीकृष्ण के कर्म सिद्धांत को अपने आचरण में साकार करना है। तभी जन्माष्टमी केवल कैलेंडर का एक पर्व नहीं रहेगी, वह हमारे भीतर परिवर्तन का उत्सव बनेगी।
इस जन्माष्टमी दीपक केवल मंदिर में न जले, एक दीपक हमारे भीतर भी जले। श्रीकृष्ण केवल झाँकी में न दिखें, हमारे विचारों, निर्णयों और कर्मों में भी दिखाई दें।
जब परिस्थितियाँ विपरीत हों और जिंदगी बार बार परीक्षा ले - श्रीकृष्ण से बिखरना नहीं निखरना सीखिए
जब जीवन बार बार चोट करे, योग्यता के बदले अपमान मिले, परिश्रम के बाद भी रास्ते बंद दिखाई दें और मन पूछने लगे, “आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”, तब श्रीकृष्ण और कर्ण के बीच का एक संवाद हमें जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण देता है।
कर्ण बहुत व्यथित था। वर्षों से जमा पीड़ा प्रश्न बनकर श्रीकृष्ण के सामने फूट पड़ी, “हे श्रीकृष्ण, मेरा दोष क्या था? जन्म लेते ही माता ने मुझे छोड़ दिया। क्षत्रिय कुल में जन्मा, फिर भी सूतपुत्र कहलाया। मेरी योग्यता से पहले मेरा कुल पूछा गया। द्रोणाचार्य से शिक्षा चाही, लेकिन जन्म आड़े आया। परशुराम से शिक्षा मिली, तो अंत में श्राप मिला। क्षत्रिय होकर भी क्षत्रिय का सम्मान नहीं मिला।”
कर्ण की प्रश्नों की झड़ी जारी थी, “द्रौपदी के स्वयंवर में सूतपुत्र कहकर अपमानित किया गया। इंद्र छल से मेरे कवच और कुंडल ले गए। किसी जरूरतमंद की सहायता के लिए धरती से घी निकाला, तो वहाँ भी श्राप मिला। मैंने अपमान, तिरस्कार और कठिनाइयाँ सहीं, फिर भी दुनिया मुझसे ही आदर्श आचरण की अपेक्षा क्यों करती है? जब जीवन ने मेरे साथ न्याय नहीं किया, तो संसार मुझसे न्याय की अपेक्षा क्यों करता है?”
श्रीकृष्ण शांत भाव से सुनते रहे। फिर मुस्कुराकर बोले, “हे कर्ण, तुमने अपने बहुत से दुख गिना दिए, अब थोड़ा मेरा जीवन भी सुनो।”
“मेरा जन्म किसी राजमहल में नहीं, कारागार की अंधेरी कोठरी में हुआ। मेरे जन्म से पहले मेरे छह बड़े भाइयों को कंस ने मार डाला। माता पिता बेड़ियों में थे और जन्म लेते ही मुझे अपनी माता की गोद से अलग होकर आधी रात, वर्षा और उफनती यमुना के बीच दूसरे घर पहुँचना पड़ा।”
“जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में मुझे मारने के लिए पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर और अघासुर जैसे संकट आते रहे। राजवंश में जन्मा, लेकिन पालन पोषण राजमहल में नहीं, गायों, ग्वाल बालों और ब्रज की मिट्टी में हुआ।”
“जिस गोकुल और वृंदावन को अपना संसार बनाया, उसे भी छोड़ना पड़ा। यशोदा मैया, नंद बाबा और बाल सखाओं के अपार प्रेम से दूर होना पड़ा। मथुरा पहुँचा, कंस का अंत किया, लेकिन संघर्ष कहाँ समाप्त हुआ? जरासंध के बार बार आक्रमण हुए। अपने लोगों की रक्षा के लिए मथुरा छोड़ी, द्वारका बसाई और संसार ने मुझे रणछोड़ कहा।”
“महाभारत रोकने के लिए स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गया। राज्य नहीं, केवल पाँच गाँव माँगे, लेकिन वह प्रस्ताव भी अस्वीकार हुआ। युद्ध हुआ, अपने ही लोगों को एक दूसरे के विरुद्ध लड़ते देखा, अभिमन्यु को गिरते देखा, असंख्य प्रियजनों को खोया और युद्ध का दोष भी मेरे हिस्से आया। अंत में गांधारी का श्राप स्वीकार किया और अपने ही यादव वंश को विनाश की ओर जाते देखा।”
फिर श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा, “हे कर्ण, दुख तुमने भी सहे और मैंने भी। अंतर इतना है कि तुम अपने घाव गिनते रहे और मैंने घावों के बीच भी अपना कर्तव्य खोजा। तुम अपनी पीड़ाओं में जलते रहे, मैं उन्हीं पीड़ाओं के बीच मुस्कुराकर आगे बढ़ता रहा।”
“परिस्थितियाँ हमारे साथ क्या करेंगी, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन परिस्थितियाँ हमें क्या बना देंगी, यह हमारे हाथ में अवश्य होता है।”
दोस्तों, हमें अपनी हर पीड़ा याद रहती है। किसने चोट पहुँचाई, किसने सम्मान नहीं दिया, किसने हमारी योग्यता नहीं पहचानी, लेकिन दूसरे की मुस्कान देखकर हम उसके पीछे छिपे संघर्ष को भूल जाते हैं। हम मुस्कान देखते हैं, आँसू नहीं। सफलता देखते हैं, संघर्ष नहीं। किसी विशाल इमारत की ऊँचाई देखते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि उसे इतनी ऊँचाई देने के लिए उसकी नींव कितनी गहरी गई है।
जीवन भी ऐसा ही है। ऊँचाई सबको दिखाई देती है, नींव में दबे संघर्ष बहुत कम लोगों को दिखाई देते हैं।
इसलिए जब जीवन अगली बार कठिन परिस्थिति सामने रखे, तो केवल यह मत पूछिए, “मेरे साथ ही क्यों?” यह भी पूछिए, “यह परिस्थिति मुझे क्या सिखाने आई है?”
श्रीकृष्ण का जीवन यह नहीं सिखाता कि महान व्यक्ति के जीवन में दुख नहीं आते। वह सिखाता है कि दुखों के बीच भी मनुष्य अपने विवेक, कर्तव्य और चरित्र को कितना ऊँचा रख सकता है।
शिकायत परिस्थितियों को नहीं बदलती, संघर्ष हमें जरूर बदल देता है। कई बार जिसे हम अपना दुर्भाग्य समझ रहे होते हैं, वही हमारे व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव तैयार कर रहा होता है।
दोस्तों, ये विपरीत परिस्थितियाँ कई बार हमें रोकने नहीं आती हैं, बल्कि हमें कुछ अच्छा सिखाने, हमें बेहतर बनाने और मजबूत करने के लिए आती हैं। क्योंकि जितना कठोर संघर्ष होगा, उतनी ही तीव्र और विकसित सफलता होगी। ये परिस्थितियाँ हमें सिखाती हैं कि हम कैसे लड़ सकते हैं और असल में हमें मजबूत करने आती हैं।
हम अक्सर परेशानी आने पर पूरा ध्यान अपनी परेशानियों पर रखते हैं। साथ में जो अवसर हमें मिल रहा है, उस पर हमारा ध्यान जाता ही नहीं है और हम रास्ते की तलाश भी भूल जाते हैं। यदि एक गिलास पानी अस्सी प्रतिशत भरा है, तो भी हमारा मन सिर्फ बीस प्रतिशत खाली हिस्से की तरफ जाता है।
हम जिंदगी के सिर्फ अंधेरे को देखते हैं, उजाले की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। जबकि हमें यह पता होना चाहिए कि अंधेरा कुछ होता ही नहीं है। अंधेरा सिर्फ प्रकाश का अभाव है और कुछ भी नहीं।
बस जरूरत है एक दीपक जलाने की। एक विश्वास के दीपक की, एक कर्तव्य के दीपक की, एक आलस्य को जलाने वाले दीपक की और एक कठोर निर्णय लेने के दीपक की। जब हम ये दीपक जलाते हैं, तो हमारा जीवन फिर से प्रकाशमय हो जाता है।
ज्यादातर हम बत्ती बुझाकर देखते हैं कि अंधेरा कितना है और जीवन के आईने में दरारें गिनते रहते हैं। हम घंटों अंधेरे की शिकायत कर सकते हैं, लेकिन समाधान के लिए एक मिनट में मोमबत्ती जलाना हमारी बहुत सी शिकायतों का निवारण कर सकता है। परंतु हम ऐसा नहीं करते हैं।
याद रखिए, जब आप रोते हैं तो आप अकेले रोते हैं और जब आप हँसते हैं तो आपके साथ पूरी दुनिया हँसती है। दुनिया को आपके रोने से कोई लेना देना नहीं है। ध्यान रखें, आँसू आँखों को तो हल्का कर सकते हैं, पर रास्ता तो पैरों को ही तय करना पड़ता है।
ध्यान से देखिए, जो पानी जहाज को तैरा सकता है, वही उसे डुबा भी देता है। बस अंतर इतना होता है कि यदि पानी जहाज के बाहर हो तो जहाज तैरता है और यदि पानी जहाज के अंदर हो तो जहाज डूब जाता है।
इसी प्रकार आलोचना, असफलता, विरोध, कठिन परिस्थितियाँ और आर्थिक दबाव इत्यादि को अपने अंदर नहीं आने देना है। इन्हें बाहर ही तक रखना है। ध्यान रखें, बाहर का तूफान हमेशा जहाज को नहीं डुबोता है, भीतर का रिसाव अधिक खतरनाक होता है।
दोस्तों, एक बीज को देखिए। मिट्टी में दबा है, चारों तरफ अंधेरा है, ऊपर बोझ है और बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। कई बार मनुष्य की जिंदगी भी ऐसी ही हो जाती है। अब यदि वह बीज भी हमारी तरह रोता रहे कि मेरे साथ अन्याय हुआ है, मैं दबा हुआ हूँ, मैं परेशान हूँ और इसी सोच में पड़ा रहे, अपना कर्तव्य न करे, मिट्टी को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश न करे, तो वह वहीं सड़ जाएगा। लेकिन वही बीज जब मिट्टी का सीना चीरता है, तो प्रकाश तक पहुँचता है और एक दिन छोटे से पौधे से विशाल वृक्ष बन जाता है। मनुष्य भी यदि अन्याय और परेशानी का हिसाब लगाते लगाते कर्म करना छोड़ दे, तो उसका परिणाम भी उसी दबे हुए बीज जैसा होगा। संकटों की चादर को चीरकर बाहर हमें ही निकलना पड़ेगा।
दोस्तों, याद रखिए, विपरीत परिस्थितियों के पीछे कई बार कुछ अच्छा छिपा होता है। प्रकृति बार बार यही संदेश देती है। बादल टूटता है तो बारिश होती है, धरती टूटती है तो बीज बोए जाते हैं, बीज टूटता है तो पौधा निकलता है, फसल कटती है तो अन्न मिलता है, अंडे का खोल टूटता है तो नया जीवन निकलता है, गन्ना टूटता है तो मिठास मिलती है और गेहूँ पिसता है तो आटा बनता है। चंदन घिसता है तभी सुगंध देता है, मिट्टी गूँथी और पीटी जाती है तभी बर्तन बनती है। पत्थर चोट सहकर निखरता है तभी भगवान की मूर्ति बनता है और उस पर माला चढ़ती है। लोहा तपता है और हथौड़े की मार सहता है तभी औजार बनता है, सोना अग्नि से गुजरता है तभी आभूषण बनता है और हीरा कटता तथा तराशा जाता है तभी अधिक मूल्यवान होता है। यहाँ तक कि जिस बाँसुरी को श्रीकृष्ण अपने अधरों पर रखते हैं, उस बाँस में छेद न हों तो क्या वह बाँसुरी बन पाएगी?
इसलिए जब कभी आप टूटा हुआ महसूस करें, तो केवल टूटने का दर्द मत देखिए, यह भी देखिए कि शायद प्रकृति आपको कुछ नया सिखाने और निखारने वाली है। रात हमेशा रात नहीं रहती, रात केवल दिन का अभाव है और हर रात के बाद सुबह जरूर होती है। यह प्रकृति का नियम है। चोट पत्थर पर भी पड़ती है, लेकिन जो चोट खाकर बिखर गया वह कंकड़ बन गया और जो चोट सहकर निखर गया वह शंकर बन गया। टूटे हुए पत्थर पर नारियल फोड़े जाते हैं और निखरे हुए पत्थर पर माला चढ़ाई जाती है।
अब प्रश्न आपके सामने है, आज थोड़ी सी पीड़ा सहकर समस्या से निकलना है या उससे भागकर आजीवन उसे झेलना है? जो एक पल की पीड़ा से भागा, वह उम्र भर ठोकरें खाता रहा और जो थोड़ा ठहरा, थोड़ा सहा, वह फूलों का हार पाता रहा। जो बीज मिट्टी में दबकर केवल रोता रहा, वह सड़ता रहा और जो मिट्टी का सीना चीर गया, वह वृक्ष बनकर बढ़ता रहा। ध्यान रखिए, कोई आपको कितना तोड़ सकता है? एक सीमा के बाद आप टूट नहीं सकते। विज्ञान हमें बताता है कि पदार्थ अणुओं और परमाणुओं से मिलकर बना है। हमें भी अपनी उस मूल शक्ति को पहचानना होगा। कोई चीज टूटकर अपनी पूर्व अवस्था में लौटती है, तो कई बार पहले से अधिक मजबूत हो जाती है। इसलिए हर चोट को केवल विनाश मत समझिए, उसके भीतर निखरने की संभावना भी देखिए।
ध्यान रखिए, आत्मबल की शक्ति बहुत बड़ी है। मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता और दृढ़ संकल्प उसे असंभव दिखाई देने वाली सीमाओं के पार भी ले जा सकते हैं। एक पैर खोने के बावजूद एवरेस्ट पहुँचने वाली अरुणिमा सिन्हा को याद कीजिए। सुनने की क्षमता खोने के बावजूद महान संगीतकार बने बीथोवन को देखिए। देखने और सुनने में असमर्थ होने के बावजूद अपने लेखन और विचारों से विश्व प्रसिद्ध हुईं हेलेन केलर को याद कीजिए। दीपा मलिक ने व्हीलचेयर पर रहते हुए पैरालंपिक पदक जीता, स्टीफन हॉकिंग ने गंभीर शारीरिक समस्याओं के बावजूद ब्रह्मांड विज्ञान में महान उपलब्धियाँ प्राप्त कीं और बिना हाथों के जन्मीं जेसिका कॉक्स ने पैरों से विमान उड़ा दिया। इन लोगों ने कठिनाई को अपने जीवन की अंतिम सीमा मानने से इनकार कर दिया। उनके दृढ़ संकल्प और दृढ़ इच्छा ने उनकी सीमाओं से बड़ा उनका व्यक्तित्व बना दिया।
इसलिए परेशानी आए तो श्रीकृष्ण से यह मत पूछिए, “हे श्रीकृष्ण, मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” बल्कि कहिए, “हे श्रीकृष्ण, आप मुझे रास्ता बताइए, मैं चलने को तैयार हूँ।” एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खोजिए, क्योंकि एक ही मंजिल तक पहुँचने के रास्ते अनेक हो सकते हैं। जरूरत केवल सूझबूझ, हिम्मत और आगे बढ़ने की इच्छा की है।
ध्यान रखिए, कई बार परिस्थितियाँ नहीं बदलतीं, हमें बदलना पड़ता है। विपरीत परिस्थितियाँ केवल रास्ता रोकने नहीं आतीं, कई बार वे हमें झकझोरकर आवाज लगाती हैं, कुछ नया सीखो, कुछ बेहतर करो, अधिक मजबूत बनो, निखरो और आगे बढ़ो।
इसलिए मिट्टी के नीचे दबे बीज की तरह अपनी किस्मत पर रोते मत रहिए। मिट्टी का सीना चीरिए और प्रकाश की तरफ बढ़िए। क्योंकि उसी मिट्टी में कोई बीज सड़ जाता है और उसी मिट्टी को चीरकर कोई बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। फैसला मिट्टी नहीं करती, फैसला यह करता है कि बीज ने परिस्थितियों के सामने पड़े रहना चुना या उनसे लड़कर ऊपर उठना।
जब मन हारने लगे, असफलता डराने लगे और धैर्य टूटने लगे, - श्रीकृष्ण से फिर से खड़ा होना सीखिए
दोस्तों, कई बार हमारा सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, हमारे मन के अंदर बैठा होता है। हम काम शुरू भी नहीं करते और मन पहले ही रोक देता है, “यह काम बहुत कठिन है। मुझसे नहीं होगा। मैं असफल हो गया तो लोग क्या कहेंगे? मैं बहुत परेशान हूँ। परिस्थितियाँ मेरे विपरीत हैं। ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही क्यों होता है? अब बहुत देर हो चुकी है। यह मेरे बस का नहीं है। मेरी परिस्थितियाँ अलग हैं।” मन कोरी कल्पनाएँ करता रहता है और अपनी नाकामियों को स्वयं से छिपाने के लिए नए नए बहाने ढूँढता रहता है।
यह बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति घर से निकलने से पहले यह इंतजार करे कि रास्ते की सारी ट्रैफिक लाइट एक साथ हरी हो जाएँ, तभी मैं निकलूँगा। ऐसा कभी होने वाला नहीं है। बाहर निकलिए, रास्ते में कुछ लाइट लाल मिलेंगी, कुछ हरी मिलेंगी, कहीं रुकना पड़ेगा, कहीं तेजी से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, लेकिन चलते रहेंगे तो धीरे धीरे मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। समस्या यह है कि हमारा मन रास्ते पर चलने से पहले ही पूरे रास्ते के साफ होने की गारंटी माँगता है।
अपनी असफलताओं को छिपाने की हमारी कोशिश भी कई बार शुतुरमुर्ग जैसी हो जाती है। जैसे शुतुरमुर्ग अपना सिर मिट्टी में छिपाकर मान ले कि अब बाहरी समस्या या जानवर उसे दिखाई नहीं दे रहे, इसलिए वह भी किसी को दिखाई नहीं दे रहा। हम भी अपनी नाकामियों से आँखें बंद करके सोचते हैं कि समस्या समाप्त हो गई, जबकि समस्या वहीं खड़ी रहती है।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन का मन शिथिल होने लगा, बुद्धि भ्रमित हो गई, गांडीव हाथ से गिरने लगा और शरीर विचलित होने लगा। आज के अर्जुन के पास तो एआई भी है, ज्ञान के असंख्य स्रोत हैं और ऐसे तमाम साधन उपलब्ध हैं जो उस समय नहीं थे, फिर भी जब आज का अर्जुन दुविधाओं में फँसता है तो उसकी स्थिति भी वैसी ही होने लगती है। जबकि उसके पास भी अपने दिव्यास्त्र हैं, आत्मशक्ति, संयम, मनोबल, दृढ़ विश्वास और श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया कर्तव्य मार्ग।
ध्यान रखिए, जब हम किसी चीज के पीछे पूरी दृढ़ता से पड़ जाते हैं, तो सफलता भी एक दिन हमारे कदम चूमती है। मनुष्य प्रारंभ में कितना भी मूर्ख या मंदबुद्धि क्यों न माना गया हो, निरंतर अभ्यास उसकी दिशा बदल सकता है। कालिदास को देखिए। तुलसीदास जी को देखिए, जो अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करते थे, लेकिन पत्नी के कुछ शब्दों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उनकी पत्नी रत्नावली ने कहा था, “अस्थि चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति। ऐसी जो श्रीराम में, होत न तौ भवभीति।” कभी कभी एक चोट, एक वाक्य और एक आत्मबोध पूरे जीवन को मोड़ देता है।
लेकिन हमारी आदत क्या हो गई है? हम दो फीट गड्ढा खोदते हैं और पानी खोजने लगते हैं। पानी नहीं मिला तो उस गड्ढे को और गहरा करने के बजाय दूसरी जगह नया गड्ढा खोदना शुरू कर देते हैं। फिर तीसरी जगह, फिर चौथी जगह। अर्थात बार बार दिशा और लक्ष्य बदलते रहते हैं। जबकि उसी गड्ढे को और गहरा किया जाए तो मेहनत भी बचेगी, गहराई भी बढ़ेगी और पानी मिलने की संभावना भी बढ़ेगी। लेकिन हम यह सीखने के बजाय कि चूक कहाँ हो रही है, बार बार लक्ष्य बदल देते हैं।
याद रखिए, हार और जीत में कई बार बहुत थोड़ा सा फर्क होता है। वास्तव में हर स्थिति में जीत आपकी ही हो सकती है। हारेंगे तो सीखेंगे और जीतेंगे तो सिखाएँगे। हारे हुए लोगों की कहानियाँ पढ़कर उनकी गलतियों से सीखिए, उनके तजुर्बे लिख लीजिए और जीते हुए लोगों के अनुभव से समझिए कि मंजिल तक पहुँचा कैसे जाता है।
और एक चीज जो आज बहुत तेजी से खोती जा रही है, वह है संयम। आज का युवा मोबाइल में इतना गुम और व्यस्त हो गया है कि उसे हर चीज फास्ट और सुपर फास्ट चाहिए। दसों उँगलियों से मोबाइल ऐसे चलाता है जैसे मोबाइल के अंदर ही घुस जाएगा। जरा सा नेटवर्क धीमा हुआ नहीं कि माथे पर शिकन आ जाती है, शरीर विचलित होने लगता है, दिमाग जैसे सन्न पड़ जाता है। ऐसा लगता है मानो अकाल आ गया हो, धरती बदल गई हो, पहाड़ टूट गया हो और वह एक मिनट जीवन का अंतिम पल हो। हमारा धैर्य आखिर इतना कमजोर क्यों होता जा रहा है? कहीं हम छोटी छोटी विपरीत परिस्थितियों के चंगुल में तो नहीं फँसते जा रहे हैं?
और जब आपका मन असफलता के डर से भागने लगे, तो एक साधारण सी बात सोचिए। परीक्षा देंगे, संघर्ष करेंगे, तो पास होने या जीतने की संभावना चाहे केवल एक प्रतिशत ही क्यों न हो, वह संभावना फिर भी मौजूद है। लेकिन परीक्षा ही नहीं देंगे तो असफलता निश्चित है। बिना मैदान में उतरे जीतने की संभावना शून्य है।
आज अर्जुन की तरह हमारे मन में भी अनेक दलीलें आती हैं। कभी डर की, कभी असफलता की, कभी परिस्थितियों की और कभी लोगों की। लेकिन इसी समय हमें श्रीकृष्ण की उस आवाज को सुनना है। अपने मन को संभालना है, मन को अपना मित्र बनाना है, अभ्यास को रास्ता बनाना है, विवेक को जगाना है और फिर से खड़ा हो जाना है। इसी कर्मक्षेत्र में, इसी धर्मयुद्ध में, इसी मन के कुरुक्षेत्र में हमें खड़ा होना है और मान लेना है कि जीत हमारी हो सकती है, बस जरूरत है अपना गांडीव उठाने की।
याद रखिए, जीत का संकल्प ही जीत का विकल्प है।
हम कह सकते हैं कि भगवान स्वयं अर्जुन के साथ खड़े थे, लेकिन युद्ध तो अर्जुन को ही करना पड़ा। श्रीकृष्ण रास्ता दिखा सकते थे, लेकिन गांडीव अर्जुन को ही उठाना था। आज श्रीकृष्ण हमें भी रास्ता दिखा रहे हैं, लेकिन इस कर्मयुद्ध और कर्मयुग में कर्म हमें ही करना पड़ेगा। अपनी लड़ाई हमें ही लड़नी पड़ेगी, अपना गांडीव हमें ही उठाना पड़ेगा, अपने कर्तव्य मार्ग पर हमें ही चलना पड़ेगा, परीक्षा हमें ही देनी होगी, गिरने के बाद उठना हमें ही होगा और उठकर पहला कदम भी हमें ही बढ़ाना होगा। अपने मन रूपी शत्रु से हमें ही लड़ना होगा और असफलता के बाद हमें रोकने वाली प्रत्येक बाधा का सामना भी हमें ही करना होगा।
श्रीकृष्ण हमारे साथ हैं, हमारे मन में हैं और हमें रास्ता भी बता रहे हैं। अब प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम उस रास्ते को देख रहे हैं? क्या हम उनकी आवाज सुन रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, श्रीकृष्ण जो मार्ग हमें दिखा रहे हैं, क्या हम वास्तव में उस मार्ग पर चल भी रहे हैं?
जब कर्म से भागने का मन करे और परिणाम का डर आपको रोकने लगे - श्रीकृष्ण से कर्तव्य सीखिए
दोस्तों, कर्म से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। मनुष्य को अपना नियत कर्म अनुशासित तरीके से अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इस संसार में कर्म से कोई बच ही नहीं सकता। कर्म तो सभी को करना पड़ता है, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी किया। केवल सामर्थ्यवान होने से परिणाम अपने आप चलकर आपके पास नहीं आता। सिंह भले ही जंगल का राजा हो, लेकिन शिकार स्वयं उसके पास नहीं आता। उसे भी उठना पड़ता है, चलना पड़ता है और अपना शिकार स्वयं खोजना पड़ता है। यदि जंगल का राजा भी कर्म नहीं करेगा तो भूखा मर जाएगा। फल चाहिए तो बीज बोना पड़ेगा और नदी को समुद्र तक पहुँचने के लिए बहना ही पड़ेगा।
खेत कितना भी उपजाऊ क्यों न हो, बिना बीज बोए उसमें फसल नहीं निकलेगी। सीढ़ियाँ कितनी भी ऊपर तक क्यों न जाती हों, उन पर कदम तो आपको ही रखना पड़ेगा। दीपक में कितना भी तेल क्यों न भरा हो, प्रकाश के लिए आग तो लगानी पड़ेगी। पुस्तक कितनी भी सुंदर और सजी हुई क्यों न हो, ज्ञान चाहिए तो उसे पढ़ना ही पड़ेगा। संभावनाएँ कितनी भी बड़ी हों, कर्म के बिना वे केवल संभावनाएँ ही रह जाती हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥
अर्थात अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है।
और जब कर्म करते समय परिणाम का डर मन को जकड़ने लगे, तब श्रीकृष्ण का यह संदेश याद रखिए:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। इसका अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है, बल्कि कर्म पूरी शक्ति से करना और फल की चिंता में स्वयं को कमजोर न होने देना है।
देखिए, संसार का एक नियम है, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। आप कुछ भी करेंगे तो उसका परिणाम आना तय है। जिस दिशा में जितना बल लगाया जाता है, लगभग उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया मिलती है। प्रतिक्रिया बल के अनुरूप होती है। जीवन में भी इसे ऐसे समझिए कि कर्म के अनुरूप ही फल की दिशा बनती है। हाँ, एक बात जरूर है, अंतिम फल भगवान के ऊपर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि फल पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि जो कर्म करेगा, उसका फल मिलना तय है।
दोस्तों, परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं है, लेकिन तैयारी हमारे नियंत्रण में है, प्रयास हमारे नियंत्रण में है, अनुशासन हमारे नियंत्रण में है, कौशल हमारे नियंत्रण में है और निर्णय हमारे नियंत्रण में है। इसलिए जो हमारे हाथ में नहीं है, उसके डर से जो हमारे हाथ में है, उसे क्यों छोड़ दें? परिणाम की चिंता में कर्म छोड़ देना ऐसा है जैसे मंजिल की दूरी देखकर पहला कदम ही न उठाना।
जब भगवान राम और श्रीकृष्ण भी कर्म से रहित नहीं रहे, तो हम कर्म से कैसे भाग सकते हैं?
और केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं है, कर्म में कौशल भी चाहिए। किसी विद्यार्थी के लिए केवल दस घंटे पढ़ना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या पढ़ता है और कैसे पढ़ता है। इसी प्रकार क्या बोलना है, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कई बार यह होता है कि कब बोलना है। जो व्यक्ति क्या बोलना है और कब बोलना है, इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना सीख लेता है, वही अच्छा वक्ता बनता है। यही कर्म में कौशल है। केवल मेहनत नहीं, सही दिशा में, सही समय पर और सही तरीके से की गई मेहनत परिणाम बदलती है।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन सव्यसाची थे, अर्थात असाधारण कौशल वाले धनुर्धर। उनके पास सामर्थ्य भी था और कौशल भी, लेकिन एक समय वे भी दुविधाओं में फँस गए। आज हम भी कहीं न कहीं उसी अर्जुन की तरह अपनी दुविधाओं के बीच खड़े हैं। हमें केवल अपना गांडीव उठाने की जरूरत है, अपने आत्मसंकल्प, विश्वास, दृढ़ता और मनोबल को बढ़ाने की जरूरत है।
जरूरत है एकाग्रता की। उस अर्जुन को याद कीजिए, जिसे मछली की आँख के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हमारे सामने भी हमारा लक्ष्य इतना ही स्पष्ट होना चाहिए। आज हमारी मंजिल ही हमारे अर्जुन की मछली की आँख है। जब आँख लक्ष्य पर होगी, तो आसपास का शोर हमें विचलित नहीं कर पाएगा।
दोस्तों, जिंदगी मोमबत्ती की तरह है, वह तो जल ही रही है। अब हमारे ऊपर है कि हम उसे पहले से प्रकाश से भरे कमरे में जलाते हैं या अंधेरे में जलाकर अपनी जिंदगी को प्रकाशमान करते हैं। मोमबत्ती का जलना तय है, लेकिन उसके जलने को सार्थक बनाना हमारे हाथ में है।
जिंदगी आइसक्रीम की तरह भी है, वह तो पिघल ही रही है। अब हमारे ऊपर है कि हम उसका स्वाद लेकर उसे पिघलाते हैं या यूँ ही छोड़ देते हैं। समय भी सबके पास बराबर है। बस प्रश्न यह है कि हम उसका उपयोग रील देखकर कर रहे हैं या रियल जिंदगी में कुछ कर रहे हैं। हमें रील और रियल के अंतर को समझना होगा। मोबाइल की स्क्रीन पर दूसरों की जिंदगी देखते देखते कहीं अपनी जिंदगी का समय तो नहीं निकाल रहे हैं?
और ध्यान रखिए, यदि हम समय बर्बाद कर रहे हैं तो समय भी हमसे बदला लेगा। क्या वह हमें बर्बाद नहीं करेगा? आज हम समय को बर्बाद करेंगे तो कल वही बीता हुआ समय हमारे अवसरों को बर्बाद करके हिसाब बराबर करेगा।
इसलिए केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं है। नियत कर्म को नियत विधि से करना भी आवश्यक है। केवल व्यस्त दिखाई देना कर्मयोग नहीं है। सही कर्म, सही दिशा, सही विधि, सही कौशल, अनुशासन और निरंतरता के साथ करना ही हमें मंजिल की ओर ले जाता है।
जब कर्म से मन भागने लगे, कर्म से डर लगने लगे और परीक्षा का परिणाम आपको पहले ही भयभीत करने लगे, तब बस श्रीकृष्ण के कर्मयोग को याद कीजिए। परिणाम के डर से कर्म मत छोड़िए। जो आपके हाथ में है, उसमें अपनी पूरी शक्ति लगा दीजिए और जो आपके हाथ में नहीं है, उसे श्रीकृष्ण पर छोड़ दीजिए।
क्योंकि अंततः निर्णय हमारे ही भीतर होता है।
ठान लो तो जीत है और मान लो तो हार।
अब यह आपके ऊपर है कि आप क्या चाहते हैं। परिणाम के डर से अपना गांडीव नीचे रख देना चाहते हैं या श्रीकृष्ण के कर्मयोग को याद करके उसे फिर से उठाना चाहते हैं?
जब सामने छल, अन्याय बढ़ने लगे
दोस्तों, जीवन में हर लड़ाई लड़ना बुद्धिमानी नहीं है, लेकिन हर अन्याय चुपचाप सहते रहना भी महानता नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी मजबूरी को सहनशीलता और अपने डर को संस्कार का सुंदर नाम देकर स्वयं को ही सांत्वना दे रहे हैं?
श्रीकृष्ण हमें इन दोनों अतियों के बीच का संतुलन सिखाते हैं। जहाँ संवाद से समाधान निकल सकता हो, वहाँ पहले संवाद कीजिए। जहाँ समझाने से संबंध बच सकता हो, वहाँ समझाइए। जहाँ क्षमा से सुधार संभव हो, वहाँ क्षमा कीजिए। लेकिन जब आपकी शांति को कमजोरी, सरलता को मूर्खता और क्षमा को बार बार अन्याय करने की खुली अनुमति समझ लिया जाए, तब केवल सहते रहना उचित नहीं है।
महाभारत का वह प्रसंग याद कीजिए, जब श्रीकृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर गए। सामर्थ्य उनके पास था, लेकिन पहला विकल्प युद्ध नहीं था। भगवान स्वयं याचक बनकर केवल पाँच गाँव माँगने गए। जिसके पास युद्ध की दिशा बदलने की क्षमता थी, उसने भी पहले शांति का द्वार खटखटाया। शांति उनकी कमजोरी नहीं थी और युद्ध उनकी पहली पसंद नहीं था।
लेकिन जब अन्याय लगातार बढ़ता जाए, तब केवल सहते रहना भी कोई धर्म नहीं है। “जैसे को तैसा”, “शठे शाठ्यं समाचरेत्” और “कण्टकेनैव कण्टकम्” जैसी उक्तियाँ यही बताती हैं कि परिस्थितियाँ बदलें तो रणनीति भी बदलनी चाहिए। उद्देश्य बदला लेना नहीं, न्याय होना चाहिए। क्योंकि शांति का अर्थ यह नहीं कि कोई आपके हिस्से का अधिकार भी ले जाए, आपका अपमान भी करे और अंत में आप ही स्वयं को समझाते रहें कि कोई बात नहीं, मैं तो बहुत सहनशील हूँ। कभी कभी अत्यधिक सहनशीलता सामने वाले के अन्याय का साहस भी बढ़ा देती है। काँटे का पौधा लगाकर आम की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती।
आज के युवा का कुरुक्षेत्र और आज का महाभारत
और यहीं महाभारत पाँच हजार वर्ष पुरानी कथा से निकलकर हमारे आज के जीवन में प्रवेश कर जाता है। पात्रों के नाम बदल गए हैं, युद्ध का स्वरूप बदल गया है, शस्त्र बदल गए हैं, लेकिन संघर्ष आज भी है।
यदि आज हम अर्जुन हैं, तो हमारे सामने आज के भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, जयद्रथ और शकुनि भी हैं। कभी अश्वत्थामा हमारे भीतर जागता है, कभी धृतराष्ट्र हमारा विवेक ढक देता है, कभी हम अभिमन्यु की तरह अधूरी जानकारी लेकर चक्रव्यूह में प्रवेश कर जाते हैं और कभी युधिष्ठिर की तरह यह जानते हुए भी गलत खेल में बैठे रहते हैं कि पासे हमारे पक्ष में नहीं हैं। अंतर केवल इतना है कि आज तीर दिखाई नहीं देते, घाव फिर भी लगते हैं।
लेकिन अच्छी बात यह है कि आज भी हमारा गांडीव हमारे पास है। हमारी योग्यता हमारा गांडीव है, ज्ञान हमारे तीर हैं, अनुभव हमारा कवच है, आत्मसंयम हमारी ढाल है, एकाग्रता हमारी दृष्टि है, चरित्र हमारी शक्ति है और हमारे भीतर बैठा विवेक ही हमारा श्रीकृष्ण है। समस्या कई बार अस्त्रों की कमी नहीं, बल्कि यह है कि अस्त्र हाथ में होते हुए भी हम गांडीव नीचे रखकर परिस्थितियों पर भाषण देने लगते हैं।
आज का भीष्म: जब पुरानी जड़ सोच परिवर्तन के सामने दीवार बन जाए
आज का भीष्म हमारी वह पुरानी जड़ सोच है, जो हर परिवर्तन के सामने कहती है, “हमेशा से तो ऐसा ही होता आया है।” मानो वर्षों से गलत होते रहने पर गलती को स्थायी मान्यता मिल जाती हो। वह पुरानी आदत हो सकती है, कोई पूर्वाग्रह हो सकता है या ऐसी सोच जो नई संभावना को केवल इसलिए अस्वीकार कर दे क्योंकि उसने उसे पहले कभी देखा नहीं।
यदि आज हम अर्जुन हैं, तो ऐसे भीष्म को कैसे जीतेंगे? आज हमारा शिखंडी है सत्य, तथ्य, तर्क और बदलते समय की वास्तविकता। जड़ सोच से केवल भावनाओं के सहारे मत लड़िए। प्रमाण सामने रखिए। पुरानी सोच का सम्मान कीजिए, लेकिन केवल इसलिए गलत को स्वीकार मत कीजिए कि उसके बाल सफेद हो चुके हैं। परंपरा सम्मान की पात्र है, लेकिन गलती केवल पुरानी हो जाने से सत्य नहीं बन जाती।
आज का द्रोणाचार्य: जब सम्मान हमारी स्वतंत्र सोच को बाँधने लगे
आज का द्रोणाचार्य वह पुराना प्रभाव, मोह या पूर्वाग्रह है, जिसके प्रति मन में सम्मान तो बहुत है, लेकिन जो कभी कभी हमारी स्वतंत्र सोच और आगे बढ़ने की क्षमता को रोक देता है। जिन लोगों ने हमें चलना सिखाया, उन्हीं की कोई धारणा आगे चलकर हमारे दौड़ने की सीमा बन सकती है।
ऐसे द्रोणाचार्य को जीतने का अर्थ गुरु का अपमान करना नहीं है। सम्मान अपनी जगह रखिए, लेकिन अपनी योग्यता की बलि मत दीजिए। आदर बनाए रखिए, लेकिन अपने विकास की चाबी किसी और के पूर्वाग्रह के हाथ में मत दीजिए। स्वतंत्र निर्णय लीजिए ।
आज का कर्ण: जब पुरानी पीड़ा हमारी पूरी पहचान बन जाए
आज का कर्ण कई बार हमारे भीतर बैठा होता है। वह हमारी पुरानी चोट, अपमान, तुलना और हीनभावना है। वह कहता है, “मेरे साथ अन्याय हुआ। मुझे अवसर नहीं मिला। मुझे सम्मान नहीं मिला। यदि परिस्थितियाँ दूसरी होतीं तो मैं कुछ और होता।”
हो सकता है यह सब सच भी हो। लेकिन प्रश्न यह है कि जिसने कभी आपको चोट पहुँचाई थी, क्या वर्षों बाद भी आप उसे अपने भविष्य का निर्णय करने देंगे? पीड़ा वास्तविक हो सकती है, अन्याय वास्तविक हो सकता है, लेकिन यदि पूरी जिंदगी उसी घाव को अपनी पहचान बना लिया तो प्रतिभा भी कड़वाहट की गुलाम हो जाएगी।
कुछ लोग अपनी पुरानी पीड़ा को ऐसे सँभालकर रखते हैं जैसे कोई पारिवारिक विरासत हो, समय समय पर निकालते हैं और फिर उसी को देखकर दुखी हो जाते हैं। आज के कर्ण को जीतना है तो अपनी पीड़ा को अपनी पहचान मत बनने दीजिए। अतीत से सीखिए, लेकिन अपने भविष्य का रिमोट कंट्रोल उसे मत दीजिए। अपनी प्रतिभा को शिकायत में नहीं, कर्म में लगाइए।
आज का दुर्योधन: जब अहंकार कहे कि अधिकार केवल मेरा है
आज का दुर्योधन हमारा अहंकार, लालच, ईर्ष्या और हर चीज पर अधिकार जताने की मानसिकता है। वह बाहर भी मिल सकता है और हमारे भीतर भी। वह कहता है, “मुझे ही क्यों नहीं मिला? वह मुझसे आगे कैसे निकल गया? श्रेय उसका क्यों? अधिकार तो मेरा है।”
दुर्योधन की सबसे बड़ी समस्या सामर्थ्य की कमी नहीं थी, बल्कि यह स्वीकार न कर पाना था कि दूसरे का भी कोई अधिकार हो सकता है। इसलिए आज के दुर्योधन के सामने सत्य, प्रमाण, धैर्य और सही रणनीति को अपना कवच बनाइए। और यदि दुर्योधन हमारे भीतर बैठा हो तो यह सीखिए कि हमारा अधिकार वहीं समाप्त होता है जहाँ से दूसरे का अधिकार शुरू होता है।
ईर्ष्या की विडंबना देखिए, सफलता किसी और की होती है, लेकिन जलते हम रहते हैं। सामने वाला पुरस्कार लेकर घर पहुँच जाता है और हम रात भर उसकी सफलता का पोस्टमार्टम करते रहते हैं।
आज का शकुनि: जो युद्ध खुद नहीं लड़ता, केवल पासे फेंकता है
जीवन का हर विरोधी सामने खड़ा होकर युद्ध नहीं करता। कुछ लोग शकुनि की तरह मुस्कुराते हुए आपके पास बैठते हैं। आज का शकुनि है भ्रम, षड्यंत्र, आधी अधूरी जानकारी और गलत सलाह। वह आपके मन में संदेह पैदा करेगा, बात को इधर से काटेगा, उधर से जोड़ेगा और ऐसी कहानी तैयार करेगा कि आपको लगेगा युद्ध तो आज ही करना पड़ेगा। संबंध टूटने के बाद शायद वही सबसे पहले पूछेगा, “अरे, यह सब हो कैसे गया?”
आज के शकुनि से जीतना है तो हर सलाह को सत्य मत मानिए। सलाह देने वाले की नीयत और तथ्य दोनों जाँचिए। किसी तीसरे व्यक्ति को अपने संबंधों का रिमोट कंट्रोल मत दीजिए। बहुत से जीवन युद्ध गलत शत्रु से नहीं, गलत सलाह मान लेने से हार जाते हैं। कान आपके हों तो निर्णय भी आपका होना चाहिए। मुफ्त की सलाह का बाजार बहुत बड़ा है, क्योंकि सलाह देने वाले को आपके निर्णय की कीमत नहीं चुकानी पड़ती।
आज का अश्वत्थामा: जब आहत अहंकार प्रतिशोध का सारथी बन जाए
आज का अश्वत्थामा है आहत अहंकार, अनियंत्रित क्रोध और प्रतिशोध। जब व्यक्ति हार या अपमान के बाद यह तय कर ले कि परिणाम चाहे जो हो, मुझे केवल बदला लेना है, तब विवेक पीछे बैठ जाता है और क्रोध सारथी बन जाता है।
क्रोध कुछ मिनट के लिए हमें शक्तिशाली होने का भ्रम देता है, लेकिन उन्हीं मिनटों में वर्षों की प्रतिष्ठा, संबंध और भविष्य को नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए प्रतिक्रिया और निर्णय के बीच दूरी रखिए। जब मन सबसे अधिक क्रोधित हो, उसी समय जीवन का सबसे बड़ा निर्णय मत लीजिए। अपमान का उत्तर अपनी प्रगति से दीजिए। क्रोध को ऊर्जा बनाइए, विनाश नहीं।
सोशल मीडिया पर तुरंत उत्तर दे देना, फोन पर तुरंत सुना देना और गुस्से में संबंध तोड़ देना आसान है। कठिन यह है कि चौबीस घंटे बाद भी वही निर्णय सही लगे। युद्ध जीतकर भी यदि विवेक हार गए, तो ऐसी विजय भी पराजय ही है।
आज का जयद्रथ: जब मंजिल के ठीक पहले अंतिम बाधा खड़ी हो जाए
आज का जयद्रथ वह अंतिम बाधा है जो लक्ष्य के बिल्कुल पास आकर खड़ी हो जाती है। परीक्षा से पहले बीमारी, लक्ष्य के अंतिम चरण में अचानक आई समस्या, महत्वपूर्ण काम के समय आया संकट या अंतिम क्षण की घबराहट, यही हमारे आधुनिक जयद्रथ हैं।
जयद्रथ सिखाता है कि कुछ युद्ध केवल शक्ति से नहीं, समयबद्ध संकल्प और एकाग्रता से जीते जाते हैं। जिस प्रकार अर्जुन के सामने सूर्यास्त से पहले का समय निश्चित था, उसी प्रकार हमें भी अपने महत्वपूर्ण लक्ष्यों के लिए समय सीमा तय करनी होगी।
अंतिम बाधा सामने आए तो दस दिशाओं में मत भागिए। उस समय शिकायत नहीं, समाधान चाहिए। बहाना नहीं, प्रयास चाहिए। भ्रम नहीं, फोकस चाहिए। क्योंकि बहुत से लोग मंजिल से बहुत दूर नहीं हारते, वे मंजिल के बिल्कुल पास थककर बैठ जाते हैं और फिर वर्षों तक बताते रहते हैं कि बस थोड़ा सा बाकी था। जिंदगी “बस थोड़ा सा बाकी था” वालों को पदक नहीं देती, मंजिल तक पहुँचने वालों को देती है।
आज का अभिमन्यु: जब साहस पूरा हो लेकिन जानकारी आधी हो
आज का अभिमन्यु है अधूरा ज्ञान लेकर पूरी लड़ाई में उतर जाना। उत्साह है, साहस है, ऊर्जा है, प्रवेश करना आता है, लेकिन बाहर निकलने की रणनीति नहीं मालूम।
आज कितने लोग बिना पूरी जानकारी व्यवसाय में उतर जाते हैं, बिना तैयारी परीक्षा में बैठ जाते हैं, बिना शर्तें समझे समझौते कर लेते हैं, बिना जोखिम समझे निवेश कर देते हैं और समस्या आने पर कहते हैं, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?” मानो निर्णय किसी और ने लिया था और हस्ताक्षर करते समय हाथ भी किसी और का था।
हर बार चक्रव्यूह को दोष देने से पहले यह भी देखिए कि उससे निकलने की तैयारी हमारे पास थी या नहीं। साहस रखिए, लेकिन तैयारी के साथ। प्लान ए रखिए, संभव हो तो प्लान बी भी सोचिए। उत्साह इंजन है, लेकिन ज्ञान नक्शा है। बिना नक्शे का तेज इंजन आपको बहुत तेजी से गलत दिशा में भी ले जा सकता है।
आज का युधिष्ठिर: जब अच्छाई हो लेकिन निर्णय गलत हो
आज का युधिष्ठिर हमें गहरी चेतावनी देता है। अच्छा व्यक्ति होना पर्याप्त नहीं है, सही समय पर सही निर्णय लेना भी आवश्यक है। आप ईमानदार, सत्यवादी और नेक हो सकते हैं, लेकिन यदि गलत खेल में बैठ गए, गलत शर्त स्वीकार कर ली और अपनी कमजोरी पर नियंत्रण नहीं रखा, तो अच्छाई भी परिणामों से नहीं बचा पाएगी।
आज की चौसर केवल पासों की नहीं है। वह लालच हो सकती है, गलत आदत हो सकती है, बिना सोचे लिया गया आर्थिक जोखिम हो सकता है या बार बार लिया जाने वाला ऐसा निर्णय जिसका नुकसान हमें पहले से मालूम है।
हर चुनौती स्वीकार करना वीरता नहीं है। कभी कभी गलत खेल से उठ जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है। जहाँ नियम ही गलत हों, वहाँ जीतने से पहले पूछिए कि मुझे यह खेल खेलना ही क्यों है? हम कई बार केवल इसलिए गलत खेल में बैठे रहते हैं क्योंकि उठ जाने पर लोग क्या कहेंगे। लेकिन लोग जीतने पर भी कुछ कहेंगे और हारने पर भी। इसलिए जिंदगी का निर्णय दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों की तालियों से मत कीजिए।
आज का धृतराष्ट्र: जब प्रेम विवेक की आँख बंद कर दे
आज का धृतराष्ट्र हमारा अंधा मोह है। जब हम बच्चों की हर गलती पर पर्दा डालते हैं, उनकी गलत आदत को यह कहकर छोड़ देते हैं कि “अभी बच्चा है”, या किसी प्रिय व्यक्ति की गलती जानते हुए भी उसे सही साबित करने में लग जाते हैं, तब हमारे भीतर धृतराष्ट्र जाग रहा होता है।
मोह यदि विवेक की आँख बंद कर दे तो प्रेम भी भविष्य को नुकसान पहुँचा सकता है। बच्चे को प्रेम दीजिए, संरक्षण दीजिए, लेकिन वास्तविकता से मत बचाइए। गलती को गलती कहना भी प्रेम है और समय रहते सुधारना भी जिम्मेदारी है।
हर बार बच्चे के सामने से काँटे हटाएँगे तो वह चलना तो सीख जाएगा, लेकिन काँटों वाली जिंदगी में संभलना कब सीखेगा? विडंबना यह है कि बचपन में हम उसके रास्ते के सारे पत्थर हटाते हैं, फिर बड़े होने पर शिकायत करते हैं कि बच्चा जरा सी कठिनाई में टूट क्यों जाता है। हमने उसे कठिनाई देखी ही कब थी?
आज का विदुर: वह आवाज जो मीठी नहीं लेकिन सही होती है
महाभारत केवल यह नहीं बताता कि हमारा विरोधी कौन है, वह यह भी बताता है कि कठिन समय में हमें किसकी बात सुननी चाहिए। आज का विदुर वह शांत और विवेकपूर्ण आवाज है, जो हमेशा हमारे मन की बात नहीं कहती, लेकिन हमारे हित की बात कहती है। वह कोई सच्चा मित्र, माता पिता, गुरु, अनुभवी व्यक्ति या हमारी अपनी अंतरात्मा हो सकती है।
समस्या यह है कि हमें कई बार वह व्यक्ति ज्यादा अच्छा लगता है जो हमारी हाँ में हाँ मिलाए, वह नहीं जो हमारी गलती बताए। दुर्योधन को शकुनि की बातें प्रिय लगती थीं, विदुर की नहीं। हमारे जीवन में भी यही होता है। हमें सलाह नहीं चाहिए होती, हमें अपनी बात पर मुहर चाहिए होती है। जो हमारी बात से सहमत हो गया वह समझदार और जिसने प्रश्न उठा दिया वह नकारात्मक।
जो हमें हर समय अच्छा महसूस कराए, वह जरूरी नहीं कि हमारा शुभचिंतक हो। और जो समय रहते हमारी गलती बता दे, वह जरूरी नहीं कि हमारा विरोधी हो। अपने जीवन में किसी विदुर की आवाज जरूर बचाकर रखिए, जो आपकी प्रशंसा से ज्यादा आपके सुधार की चिंता करे। तालियाँ बजाने वाले बहुत मिल जाएँगे, गिरने से पहले पकड़ने वाला दुर्लभ होता है।
आज का महाभारत: बाहर भी, भीतर भी
दोस्तों, आज का महाभारत किसी मैदान में नहीं, हमारे निर्णयों में लड़ा जा रहा है। आज का भीष्म हमारी जड़ सोच है, द्रोणाचार्य हमारा मोह और पूर्वाग्रह, कर्ण हमारी पुरानी पीड़ा, दुर्योधन हमारा अहंकार और ईर्ष्या, शकुनि गलत सलाह और भ्रम, अश्वत्थामा अनियंत्रित क्रोध, जयद्रथ अंतिम बाधा, अभिमन्यु अधूरी तैयारी, युधिष्ठिर गलत निर्णयों के प्रति हमारी कमजोरी, धृतराष्ट्र अंधा मोह और विदुर हमारी विवेकपूर्ण अंतरात्मा की आवाज है।
फर्क इतना है कि ये पात्र केवल बाहर नहीं, भीतर भी रहते हैं। इसलिए हर बार बाहर शत्रु खोजने से पहले भीतर भी निरीक्षण कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम पूरी सेना बाहर खड़ी करके लड़ने को तैयार हों और असली दुर्योधन भीतर सिंहासन पर बैठा हो।
लेकिन यदि आज हम अर्जुन हैं, तो हमारा गांडीव भी हमारे पास है। हमारी योग्यता हमारा गांडीव है, ज्ञान हमारे तीर हैं, अनुभव हमारा कवच है, आत्मसंयम हमारी ढाल है, एकाग्रता हमारी दृष्टि है, सत्य हमारा बल है और हमारे भीतर बैठा विवेक ही हमारा श्रीकृष्ण है।
इसलिए आज के अर्जुन को केवल युद्ध करना नहीं आना चाहिए। उसे यह भी समझना होगा कि कब शांति करनी है, कब बोलना है, कब चुप रहना है, किसकी सलाह सुननी है, किससे दूरी बनानी है, कब क्षमा करनी है, कब दृढ़ होना है और कब अपनी पूरी शक्ति के साथ खड़ा हो जाना है। हर जगह तलवार निकाल लेना वीरता नहीं है और हर जगह सिर झुका देना विनम्रता नहीं है। सही परिस्थिति में सही प्रतिक्रिया ही नीति है।
हर युद्ध शस्त्र से नहीं जीता जाता। कहीं सत्य चाहिए, कहीं तर्क, कहीं आत्मसंयम, कहीं प्रमाण, कहीं एकाग्रता, कहीं संपूर्ण तैयारी, कहीं समय पर लिया गया निर्णय और कहीं मोह से ऊपर उठने का साहस। यही आज के अर्जुन के आधुनिक अस्त्र हैं।
श्रीकृष्ण की नीति हमें हर बात पर युद्ध करना नहीं सिखाती। पहले शांति, फिर संवाद, फिर समझाने का प्रयास और फिर न्यायपूर्ण समझौता। लेकिन जब सामने वाला हर रास्ता बंद कर दे, आपकी शांति को कमजोरी समझने लगे और अन्याय को अपना अधिकार मान बैठे, तब धर्मसम्मत रणनीति के साथ दृढ़ता से खड़ा होना भी आवश्यक है।
इसलिए अपने हिस्से के कुरुक्षेत्र से भागिए मत। पहले पहचानिए कि आपके सामने कौन सा भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, शकुनि और जयद्रथ है। फिर अपने भीतर भी देखिए कि कहीं कोई धृतराष्ट्र, अश्वत्थामा या अधूरी तैयारी वाला अभिमन्यु तो नहीं बैठा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम बाहर के शकुनि से परेशान हैं, लेकिन भीतर का अहंकार उसकी हर बात सुनने के लिए तैयार बैठा है? कहीं हम बाहर के दुर्योधन को दोष दे रहे हैं, लेकिन अपने हिस्से का युधिष्ठिर गलत खेल से उठने को तैयार नहीं है?
और उसके बाद अपने भीतर के श्रीकृष्ण की आवाज सुनिए। क्योंकि असली समस्या हमेशा यह नहीं होती कि हमारे सामने कौन खड़ा है। कई बार असली प्रश्न यह होता है कि हमारे भीतर सारथी कौन है, विवेक या अहंकार?
जब नीयत साफ हो, उद्देश्य न्यायपूर्ण हो, शांति का पूरा प्रयास किया जा चुका हो और फिर भी अधर्म सामने खड़ा हो, तब अपना गांडीव नीचे मत रखिए। पहले शांति कीजिए, फिर नीति अपनाइए और आवश्यकता पड़े तो धर्मसम्मत रणनीति के साथ अपने हिस्से के धर्म के लिए दृढ़ता से खड़े हो जाइए।
जब रिश्ते, पैसे और जीवन की जिम्मेदारियाँ उलझने लगें, तब श्रीकृष्ण से मित्रता, सेवा, विनम्रता, नेतृत्व और संतुलन सीखिए
जीवन की असली परीक्षा हमेशा अभाव में नहीं होती। कभी कभी परीक्षा तब शुरू होती है जब हमारे पास लगभग सब कुछ आ जाता है। पैसा भी होता है, सफलता भी होती है, धन भी होता है, पद भी होता है, प्रसिद्धि भी होती है, प्रतिष्ठा भी होती है। लेकिन इन सबके बीच यदि शिष्टता, अच्छा व्यवहार और विनम्रता पीछे छूट जाए तो परिणाम क्या है? पतन।
असली परीक्षा तब है जब आपके पास शक्ति हो और फिर भी व्यवहार में सरलता हो, पद हो लेकिन अहंकार न हो, धन हो लेकिन संवेदना बची रहे, सफलता हो लेकिन पुराने रिश्ते छोटे न लगने लगें। श्रीकृष्ण का जीवन इसी संतुलन का अद्भुत उदाहरण है। द्वारका का वैभव भी उनके व्यक्तित्व को बदल नहीं पाया और सुदामा की निर्धनता भी उनकी मित्रता को छोटा नहीं कर पाई।
एक ओर द्वारकाधीश श्रीकृष्ण, वैभव, सत्ता और सामर्थ्य के शिखर पर। दूसरी ओर उनके बालसखा सुदामा, निर्धनता में जीवन बिताते हुए। लेकिन जब सुदामा श्रीकृष्ण के द्वार पहुँचे, तब श्रीकृष्ण नंगे पैर दौड़े, छप्पन भोग पाने वाले श्रीकृष्ण ने सुदामा के लाए सूखे चावल प्रेम से खाए और अपने मित्र के पैर आँसुओं से धोए।
यही मित्रता की असली परीक्षा है। विद्यालय और कॉलेज में साथ चाय पीने वाले मित्र जब जीवन में अलग अलग ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं, तब पता चलता है कि मित्रता कितनी सच्ची थी। सफलता के बाद मोबाइल में पुराने मित्र का नंबर तो बचा रहता है, लेकिन कई बार मन की संपर्क सूची से उसका नाम मिट जाता है। पद बदलते ही संबोधन बदल जाता है और आय बढ़ते ही मित्रों की श्रेणी भी बदलने लगती है।
श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जिस सफलता के बाद आपको अपने पुराने सच्चे रिश्ते छोटे दिखाई देने लगें, वह सफलता आपकी ऊँचाई नहीं, आपके अहंकार की ऊँचाई बता रही है।
सच्ची सहायता वह नहीं जो किसी की समस्या समाप्त कर दे, सच्ची सहायता वह है जो उसकी समस्या हल करने की क्षमता बढ़ा दे।
श्रीकृष्ण जैसा सारथी: रथ आपका हो, निर्णय की क्षमता भी आपकी बने
कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने। उन्होंने अर्जुन को ज्ञान दिया, भ्रम दूर किया, परिस्थितियाँ समझाईं, धर्म और कर्तव्य का बोध कराया, लेकिन युद्ध अर्जुन के स्थान पर स्वयं नहीं लड़ा। गांडीव अर्जुन को ही उठाना पड़ा।
यही जीवन का सिद्धांत है। हमें अच्छे सारथी बनना भी है और अपने जीवन के लिए अच्छे सारथी की तलाश भी करनी है। ऐसा मित्र, गुरु, माता पिता, शिक्षक या मार्गदर्शक, जो हमारे स्थान पर हर निर्णय न करे, बल्कि हमें सही निर्णय लेने योग्य बनाए और अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए।
आज सहायता के नाम पर हम कई बार दूसरे का रथ अपने हाथ में ले लेते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि वह स्वयं निर्णय क्यों नहीं लेता। जिसे वर्षों तक निर्णय लेने ही नहीं दिया, वह अचानक निर्णयकर्ता कैसे बन जाएगा?
अच्छा सारथी दिशा दिखाता है, लेकिन यात्री की यात्रा अपने नाम नहीं लिखता।
नेतृत्व का अर्थ कुर्सी नहीं, दूसरों को सक्षम बनाना है
श्रीकृष्ण महाभारत के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में हैं, लेकिन कुरुक्षेत्र में उन्होंने न राजा का सिंहासन माँगा, न सेनापति का पद लिया। उन्होंने सारथी की भूमिका स्वीकार की। सामर्थ्य के शिखर पर होकर भी सेवा की भूमिका स्वीकार करना नेतृत्व और विनम्रता का कितना बड़ा उदाहरण है।
आज नेतृत्व को कई बार पद, कुर्सी, अधिकार और आदेश देने की शक्ति से मापा जाता है। पद मिलते ही कुछ लोगों की आवाज बदल जाती है, व्यवहार बदल जाता है और पुराने परिचित अचानक छोटे लगने लगते हैं। नाम के आगे पद जुड़ते ही यदि व्यवहार से विनम्रता कम हो जाए, तो पद बढ़ा है, व्यक्तित्व नहीं।
अच्छा नेता वह नहीं जिसके बिना कोई काम ही न हो सके। अच्छा नेता वह है जो ऐसी व्यवस्था और ऐसे लोग तैयार करे कि उसकी अनुपस्थिति में भी काम सुचारु रूप से चलता रहे। जो हर निर्णय स्वयं लेना चाहता है, वह शायद नियंत्रण कर रहा है, नेतृत्व नहीं।
नेतृत्व की सबसे बड़ी सफलता अपने महत्व को बढ़ाना नहीं, दूसरों की क्षमता बढ़ाना है।
केवल नकल करके जीवन नहीं बनता: दूसरे का रास्ता आपकी मंजिल नहीं बताता
जीवन की एक बड़ी उलझन तुलना और नकल भी है। विद्यार्थी कई बार करियर इसलिए चुन लेते हैं क्योंकि उनके मित्रों ने चुना है। कोई व्यवसाय इसलिए शुरू करता है क्योंकि पड़ोसी उसमें सफल हुआ। कोई स्थान इसलिए चुनता है क्योंकि वहाँ किसी दूसरे व्यक्ति की दुकान अच्छी चल रही है।
लेकिन सामने वाले की योग्यता, रुचि, परिस्थिति, पूँजी, अनुभव, व्यक्तित्व और जोखिम उठाने की क्षमता हमारी जैसी हो, यह आवश्यक नहीं है। दूसरे की सफलता देखकर उसका रास्ता कॉपी करना आसान है, लेकिन उसकी वर्षों की तैयारी, असफलताएँ और संघर्ष कॉपी करने में हमारी रुचि अक्सर कम हो जाती है।
सोशल मीडिया ने तुलना को और आसान कर दिया है। हमें परिणाम दिखाई देता है, प्रक्रिया नहीं। सफलता दिखाई देती है, संघर्ष नहीं। चमकता हुआ मंच दिखाई देता है, उसके पीछे बिताई गई अनगिनत रातें नहीं।
इसलिए किसी से प्रेरणा अवश्य लीजिए, लेकिन अपना जीवन उसकी फोटो कॉपी मत बनाइए। प्रेरणा दिशा दे सकती है, लेकिन जीवन का निर्णय आपकी प्रकृति, क्षमता और परिस्थिति के अनुसार होना चाहिए।
परवरिश
दोस्तों श्रीमद् भागवत गीता जो अथाह सागर है वह हमें यह भी बताता है कि हमें अपने बच्चों की परवरिश कैसे करनी चाहिए । गूढ़ रहस्य में सब कुछ समेकित है
कठिनाइयाँ हमें सिखाने भी आती हैं। जिराफ के बच्चे को देखिए। जन्म के तुरंत बाद उसकी माँ उसे बार बार उठने और अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए मजबूर करती है, क्योंकि वह जानती है कि आज का संघर्ष ही कल उसे जंगल के जानवरों से बचाएगा। बाज भी अपने बच्चों को कठिन प्रशिक्षण देता है। वह केवल यह कहकर नहीं बैठ जाता कि मेरा मुन्ना है, मेरा बेटा है, मेरा बच्चा है। उसे पता है कि यह केवल उसके लिए बच्चा है, संसार के लिए एक साधारण पक्षी है, जिसे अपने पंखों पर उड़ना स्वयं सीखना होगा।
हमारा बच्चा भी हमारे लिए लाडला हो सकता है, दुनिया के लिए नहीं। यदि हम उसे हर कठिनाई से बचाकर रखेंगे तो कब तक बचाएँगे? हम कब तक उसके साथ रहेंगे? भविष्य की कठिनाइयों से निपटना और उनसे निखरना उसे कौन सिखाएगा? यदि मेहनत, अनुशासन, पढ़ाई और जिम्मेदारी से दूर रखकर केवल लाड़ प्यार में पालन पोषण करेंगे और जीवन के वास्तविक संघर्षों से परिचित नहीं कराएँगे, तो कल जीवन की कठिनाइयों का सामना करना उसे कौन सिखाएगा?
यही बात बच्चों के पालन पोषण में भी समझनी होगी। बच्चों को केवल चलना नहीं, गिरना और गिरकर उठना भी सिखाना है। उन्हें कठिन काम स्वयं करने दीजिए। यदि हर असफलता, हर कठिनाई और हर संघर्ष से हम उन्हें बचा लेंगे, तो क्या वे भविष्य की परेशानियों को झेलने के लिए तैयार हो पाएँगे? अपने बच्चे को हर संघर्ष और हर मुश्किल से बचाएँगे तो वह सीखेगा कैसे? गिरने से डराएँगे तो संभलना कब सिखाएँगे? चढ़ने से डराएँगे तो ऊँचाई कहाँ से देखेंगे? हार से भगाएँगे तो जीत की कीमत कैसे समझेंगे? हमारा उद्देश्य जानबूझकर बच्चे को पीड़ा देना नहीं है, बल्कि जीवन की स्वाभाविक कठिनाइयों से उसे सीखने देना और भविष्य के लिए योग्य बनाना है।
माता पिता का प्रेम तभी सार्थक है जब उसमें विवेक भी जुड़ा हो। बच्चे की हर गलती को बचाना, उसकी कमजोरी पर पर्दा डालना या हर कठिनाई उससे दूर कर देना उसे मजबूत नहीं बनाता। सही समय पर गलती बताना, परिणाम समझाना और छोटी कठिनाइयों का सामना स्वयं करने देना भी प्रेम का ही रूप है।
यदि हम हर रास्ता साफ कर देंगे, हर निर्णय स्वयं लेंगे और हर ठोकर से पहले उसे बचा लेंगे, तो वह सुविधा का अभ्यस्त तो हो जाएगा, जीवन का सामना करना नहीं सीखेगा। अच्छे माता पिता बच्चे के लिए जीवन आसान नहीं बनाते, उसे जीवन संभालने योग्य बनाते हैं।
बच्चे को केवल सुरक्षा मत दीजिए, उसे साहस, विवेक और स्वयं खड़े होने की क्षमता भी दीजिए। यदि बच्चे का बैग भी हम उठाएँ, हर विवाद हम सुलझाएँ, हर निर्णय हम लें, हर असफलता से उसे बचाएँ और रास्ते का हर पत्थर पहले ही हटा दें, तो हम उसकी सहायता कम और उसकी क्षमता को कमजोर अधिक कर रहे होंगे।
माता पिता का अधूरा सपना: बच्चे का भविष्य या अपनी महत्वाकांक्षा की दूसरी पारी?
यही बात बच्चों के पालन पोषण पर भी लागू होती है। कई माता पिता अपने बच्चे से वह सब करवाना चाहते हैं जो वे स्वयं अपने जीवन में नहीं कर पाए। जो स्वयं कभी प्रथम श्रेणी नहीं ला पाए, वे बच्चे से नब्बे प्रतिशत, पचानवे प्रतिशत और कभी कभी सौ प्रतिशत तक की उम्मीद करते हैं और घोषणा कर देते हैं, “तुम्हें फर्स्ट ही आना है।”
एक बार अपने भीतर झाँककर पूछिए, जो अपेक्षा हम बच्चे से कर रहे हैं, क्या वही अपेक्षा कभी हमने स्वयं से भी की थी? जीवन में जो हम नहीं कर पाए, क्या अब हमारी सारी अधूरी आकांक्षाएँ बच्चे को पूरी करनी हैं? क्या वह हमारे हाथ की कठपुतली है? क्या हमारे सारे अधूरे सपनों का ठेका अब उसी के हिस्से में आ गया है?
डॉक्टर हम नहीं बन पाए तो बच्चा डॉक्टर बने। इंजीनियर बनने की इच्छा हमारी थी तो वह इंजीनियर बने। हमारी प्रतिष्ठा की कल्पना अधूरी रह गई तो बच्चा रैंक लाकर उसे पूरा करे। और यदि उसकी रुचि कहीं और है तो हम तुरंत चिंतित हो जाते हैं कि इसका भविष्य क्या होगा। कई बार चिंता बच्चे के भविष्य की कम और अपने बनाए भविष्य के नक्शे के बिगड़ने की अधिक होती है।
अपने बच्चे को अपनी निजी परियोजना मत बनने दीजिए।
बच्चा आपकी संपत्ति नहीं है। वह आपके माध्यम से जीवन में आया एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। आपका काम उसके लिए जीवन लिख देना नहीं, उसे अपना जीवन समझने और लिखने योग्य बनाना है।
अच्छे माता पिता भी सारथी होते हैं, चालक नहीं
श्रीकृष्ण के सारथी रूप से माता पिता बहुत बड़ी सीख ले सकते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया, उसके प्रश्नों के उत्तर दिए, सही और गलत का विवेक दिया, लेकिन अंततः निर्णय और कर्म की जिम्मेदारी अर्जुन की ही रही।
माता पिता को भी बच्चे के जीवन में सारथी होना चाहिए, चालक नहीं। मार्ग बताइए, लेकिन उसकी हर दिशा स्वयं तय मत कीजिए। अनुभव दीजिए, लेकिन प्रयोग की स्वतंत्रता भी दीजिए। अनुशासन सिखाइए, लेकिन व्यक्तित्व मत कुचलिए। गलती पर रोकिए, लेकिन हर असफलता से बचाकर इतना नाजुक भी मत बनाइए कि पहली वास्तविक ठोकर में उसका आत्मविश्वास टूट जाए।
यदि हम बच्चे के लिए हर निर्णय लेते रहेंगे, तो वह हमारी आज्ञा मानने में दक्ष हो सकता है, लेकिन अपने जीवन का निर्णय लेने में कमजोर रह जाएगा। फिर जब वह बड़ा होकर हर बात में हमसे पूछेगा, तब हमें आश्चर्य होगा कि इसमें आत्मविश्वास क्यों नहीं है।
बच्चों को इतना संरक्षण भी मत दीजिए कि वे जीवन की वास्तविकता से अपरिचित रह जाएँ। पौधे को धूप से हमेशा बचाकर रखेंगे तो वह सुरक्षित तो दिख सकता है, मजबूत नहीं बनेगा।
बच्चे को अपनी छाया में सुरक्षित रखने से अधिक आवश्यक है उसे धूप में चलने योग्य बनाना।
और यही भाग पाँच की मूल सीख है। श्रीकृष्ण से ऐसी मित्रता सीखिए जो स्थिति देखकर न बदले, ऐसी सेवा सीखिए जो दूसरे को निर्भर नहीं बल्कि सक्षम बनाए, ऐसी विनम्रता सीखिए जो सफलता के बाद भी बनी रहे, ऐसा नेतृत्व सीखिए जो दूसरों को आगे बढ़ाए और ऐसा संतुलन सीखिए जिसमें रिश्ते, पैसा, पद और जिम्मेदारियाँ हमारे व्यक्तित्व पर शासन न करने लगें।
जीवन में स्वयं भी किसी के लिए अच्छा सारथी बनिए और अपने लिए भी अच्छे सारथी चुनिए। क्योंकि सच्चा मित्र, अच्छा माता पिता, श्रेष्ठ शिक्षक और वास्तविक नेता आपको अपनी उँगली पकड़ाकर जीवन भर नहीं चलाता। वह एक समय के बाद आपकी उँगली छोड़कर आपको अपने पैरों पर चलने का विश्वास देता है।
श्रीकृष्ण की तरह साथ रहिए, दिशा दीजिए, सामर्थ्य जगाइए, लेकिन किसी का जीवन अपने हाथ में मत ले लीजिए। क्योंकि श्रेष्ठ संबंध वह नहीं जो हमें हमेशा सहारा देता रहे, श्रेष्ठ संबंध वह है जो एक दिन हमें स्वयं अपना सहारा बनने योग्य बना दे।
इस जन्माष्टमी जब हम आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएँ, तो केवल कारागार के द्वार खुलने की कथा न सुनें; अपने भीतर के किसी बंद द्वार को भी खोलें। किसी पुराने भय को बाहर जाने दें। किसी शिकायत को छोड़ें। किसी रुके हुए कर्म को शुरू करें। किसी मित्र का मौन पढ़ें। किसी बच्चे को केवल लाड़ नहीं, सही दिशा दें। किसी जरूरतमंद की गरिमा बचाते हुए सहायता करें। जहाँ अन्याय है वहाँ विवेकपूर्ण साहस दिखाएँ। जहाँ अहंकार है वहाँ थोड़ा झुकें। जहाँ परिणाम हमारे हाथ में है वहाँ पूरी शक्ति लगाएँ, और जहाँ नहीं है वहाँ विश्वास रखें। तभी जन्माष्टमी केवल कैलेंडर का पर्व नहीं, हमारे भीतर कृष्ण-चेतना के जन्म का अवसर बन सकती है।
लेखक: ओम प्रकाश कसेरा
ओम प्रकाश कसेरा पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक तथा सामाजिक और प्रेरक विषयों के लेखक हैं। मानवीय संबंधों, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।

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