प्रिय पाठक, 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। हम सभी से बहुत धूमधाम से मनाने को तैयार हैं। क्या हम इसको अपने जीवन में श्री कृष्ण की शिक्षाओं को जीवन में उतार रहे हैं? श्रीकृष्ण के विचारों का जन्म हमारे भीतर कब होगा?
संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी होकर भी वे गरीब सुदामा के पैर धोते हैं, अर्जुन का रथ हाँकते हैं, पांडवों के लिए याचक बन जाते हैं और ग्वाल बालों से खेल में हार भी जाते हैं। उनका हृदय कितना कोमल, स्वभाव कितना सरल और व्यक्तित्व कितना अहंकार शून्य है। हमें उनके इसी विवेक, साहस, करुणा और कर्तव्यबोध को अपने भीतर जगाना है।
दूसरी तरफ हमारी स्थिति देखिए। ठंडी चाय, देर से आए संदेश या कमजोर मोबाइल नेटवर्क जैसी छोटी बातों पर भी हमारे भीतर महाभारत छिड़ जाता है। दोस्त की नई गाड़ी देखकर ईर्ष्या, सोशल मीडिया की चमक देखकर असंतोष और दूसरों की प्रशंसा पर आहत होता झूठा स्वाभिमान हमारी रोजमर्रा की आदत बन चुके हैं। समय बदला है, पर मानसिक संघर्ष वही है। हाथ में गांडीव न सही, पर जीवन का कुरुक्षेत्र आज भी कम नहीं है। कहीं नौकरी और व्यापार की चिंता है, तो कहीं कर्ज, बीमारी, बिखरते रिश्ते और गिरता आत्मसम्मान। गीता का ज्ञान आज के यथार्थ में भी उतना ही प्रासंगिक है।
असली सवाल यह है कि जीवन रूपी कुरुक्षेत्र में हम मुश्किलों से घबराकर हथियार डाल देंगे या कर्तव्य पथ पर डटे रहेंगे? इस जन्माष्टमी पर केवल पूजा घर में नहीं, एक दीपक हमारे भीतर भी प्रज्वलित हो। श्रीकृष्ण सिर्फ मंदिर की झाँकियों में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, निर्णयों और कर्मों में दिखाई दें।
श्रीकृष्ण से बिखरना नहीं, निखरना सीखिए
जब जीवन बार-बार परीक्षा ले और मन पूछे कि "मेरे साथ ही ऐसा क्यों?", तब श्रीकृष्ण और कर्ण का संवाद जीवन को नई दिशा देता है। कर्ण ने अपनी व्यथा गिनाई कि जन्मते ही त्याग दिया गया, सूतपुत्र कहलाया, द्रोणाचार्य ने ठुकराया, परशुराम से श्राप मिला, द्रौपदी के स्वयंवर में अपमान हुआ और कवच-कुंडल छल से छिन गए। जब जीवन ने न्याय नहीं किया, तो संसार न्याय की अपेक्षा क्यों करता है?
श्रीकृष्ण मुस्कुराकर बोले कि मेरा जन्म कारागार में हुआ, जन्म से पहले भाई मारे गए और जन्मते ही माता-पिता से बिछड़ना पड़ा। बचपन में पूतना और बकासुर जैसे संकट आए, राजवंश में जन्म लेकर भी पालन ग्वालों के बीच हुआ। गोकुल छूटा, मथुरा छूटी, 'रणछोड़' कहलाया और शांति के प्रयास विफल होने पर महाभारत का कलंक भी सहा। अंत में यादव वंश का विनाश और गांधारी का श्राप भी झेला। कर्ण, दुख तुमने भी सहे और मैंने भी; अंतर यह है कि तुम घाव गिनते रहे और मैं घावों के बीच भी मुस्कुराते हुए कर्तव्य पथ पर बढ़ता रहा।
हम अक्सर दूसरों की सफलता देखते हैं, उसके पीछे की नींव और संघर्ष नहीं। कठिन परिस्थिति हमें सिखाने और मजबूत करने आती है। हमारा ध्यान खाली गिलास पर अधिक जाता है, जबकि अंधेरा केवल प्रकाश का अभाव है। अंधेरे की शिकायत करने से बेहतर है कि विश्वास, कर्तव्य और दृढ़ संकल्प का दीपक जलाया जाए। जो पानी जहाज के बाहर रहता है वह उसे तैराता है, लेकिन भीतर आते ही डुबा देता है; वैसे ही दुख और व्यथा को मन के भीतर प्रवेश मत करने दीजिए।
यदि बीज मिट्टी में दबने की शिकायत करे तो सड़ जाएगा, लेकिन सीना चीरकर बाहर निकले तो विशाल वृक्ष बनता है। प्रकृति भी यही सिखाती है: बादल फटने पर बारिश होती है, बीज टूटने पर पौधा उगता है, गेहूँ पिसने पर आटा बनता है, चंदन घिसने पर सुगंध देता है, सोना आग में तपकर कुंदन बनता है और बाँस छिदने के बाद ही बाँसुरी बनता है। पत्थर चोट सहकर निखर जाए तो भगवान बन जाता है और बिखर जाए तो कंकड़।
आत्मबल की शक्ति असीम है। अरुणिमा सिन्हा, बीथोवन, हेलेन केलर, स्टीफन हॉकिंग, दीपा मलिक और जेसिका कॉक्स जैसे दिग्गजों ने कभी सीमाओं के आगे घुटने नहीं टेके। जब भी जीवन में टूटा हुआ महसूस करें, विश्वास रखिए कि प्रकृति आपको कुछ नया सिखाकर निखारने की तैयारी कर रही है।
श्रीकृष्ण से कर्तव्य सीखिए: कर्म ही जीवन का आधार है
कर्म से कोई नहीं बच सकता, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को भी कर्म करना पड़ा। जंगल का राजा सिंह हो या समुद्र की ओर बढ़ती नदी, बिना प्रयास और गति के किसी का अस्तित्व संभव नहीं है। संभावनाएँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों, कर्म के अभाव में वे केवल कल्पना बनकर रह जाती हैं।
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्म के बिना शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता। परिणाम हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन हमारी तैयारी, प्रयास और अनुशासन पूरी तरह हमारे हाथ में है। जब श्रीराम और श्रीकृष्ण ने भी कर्म के मार्ग को अपनाया, तो हम इससे कैसे पीछे हट सकते हैं?
कुरुक्षेत्र में महाधनुर्धर अर्जुन भी दुविधा में फँस गए थे। आज हम भी उसी मोड़ पर खड़े हैं। हमें केवल अपने संकल्प, विश्वास और मनोबल का गांडीव उठाने की आवश्यकता है। अपनी मंजिल को अर्जुन की मछली की आँख की तरह देखिए, ताकि आसपास का शोर आपको भटका न सके।
हमें रील और रियल ज़िंदगी के अंतर को समझना होगा। समय व्यर्थ गँवाने पर समय उसका हिसाब ज़रूर बराबर करता है। मान लेने से हार और ठान लेने से जीत तय होती है। अब निर्णय आपका है कि परिणाम के भय से गांडीव नीचे रखना है, या श्रीकृष्ण के कर्मयोग से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ना है।
आज का महाभारत: हमारे भीतर और बाहर का संघर्ष
महाभारत सिर्फ एक पौराणिक गाथा नहीं, हमारे अंतर्मन और फैसलों का रोज़मर्रा का कुरुक्षेत्र है।
हमारे भीतर का भीष्म वह दकियानूसी सोच है जिसे तर्क से बदलना होगा। द्रोणाचार्य वे आदरणीय परंपराएं हैं जिनका सम्मान करते हुए भी अपने फैसले खुद लेने चाहिए। कर्ण हमारे भीतर का पुराना दर्द और हीनभावना है, अपनी चोट को नहीं बल्कि अपनी
ताकत को पहचान बनाइए। दुर्योधन हमारा अहंकार है, शकुनि भटकाने वाली गलत सलाह, अश्वत्थामा खुद को जलाने वाला प्रतिशोध और जयद्रथ लक्ष्य से ठीक पहले की वह बाधा है जिसे केवल एकाग्रता और पक्के इरादे से भेदा जा सकता है।
अभिमन्यु सिखाता है कि केवल जोश नहीं, पूरी तैयारी और ज्ञान ज़रूरी है। युधिष्ठिर आगाह करते हैं कि जहाँ खेल के नियम ही गलत हों, वहाँ से समय रहते हट जाना ही बुद्धिमानी है। धृतराष्ट्र वह अंधा मोह है जो अपनों की कमियों पर पर्दा डालता है, जबकि विदुर अंतरात्मा की वह सच्ची आवाज़ है जो कड़वी होकर भी सही राह दिखाती है।
यदि आप आज के अर्जुन हैं, तो आपकी काबिलियत आपका गांडीव है, ज्ञान तीर, तजुर्बा कवच और आपका विवेक ही श्रीकृष्ण है। हर बात पर टकराव ठीक नहीं, पहले शांति और संवाद चुनिए। लेकिन जब बात आत्मसम्मान और सत्य की हो, तो अपने विवेक के साथ पूरी निडरता से खड़े हो जाइए।
इस जन्माष्टमी जब हम जन्म का उत्सव मनाएँ, तो केवल कारागार के द्वार खुलने की कथा न सुनें; अपने भीतर के किसी बंद द्वार को खोले जो हमारे भीतर कृष्ण-चेतना के जन्म का अवसर बन सकती है।
लेखक: ओम प्रकाश कसेरा
ओम प्रकाश कसेरा पेशे से बैंकर, स्वच्छंद विचारक तथा सामाजिक और प्रेरक विषयों के लेखक हैं। मानवीय संबंधों, सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील एवं विचारोत्तेजक लेखन में उनकी विशेष रुचि है।

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